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निर्जीव मनेरी! / असंगघोष

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मनेरी! [1]
तुम्हारे पड़ोस में ही
एक बस में लगी आग से
सुलग गए थे
सैंतीस जिन्दा इंसान
कोयले में तब्दील होने वाली
वे लाशें किसकी थीं
नहीं मालूम
बस को जलती देख
कई लोग दौड़ पड़े थे
पर कोई बचा न पाया
एक भी जिन्दा इन्सान
माद्दा ही कहाँ था
किसी को बचाने

बस में थीं कई लाशें
एक के ऊपर ए पड़ी
जिन्हें निकालने
कोई आगे नहीं बढ़ा
सब ढँके थे
अपनी नाक
बिना धुले रूमाल से
अधजले इंसानों की
सड़ांध गंदे रूमाल से
कहीं तेज थी

चार लाशें जलकर गिरीं
औंधे मुँह सड़क के दोनों ओर
शायद जलते हुए भी
वे चैतन्य रही होंगी?
तभी बस से निकल
सकीं जलती हुईं

एक लाश औरत की थी
जिसने पहन रखी थी
कमर में करधनी
वह पहचान ली गई
करधनी देख
जो बुरी तरह जल कर
सुकड़ गए थे
उन्हें तो कोई भी
पहचान ही नहीं पाया

एक औरत का पेट पंक्चर हो
बच्चा बाहर आ माँ के साथ ही
जल गया था
दोनों की पहचान मान ली गई
यदि वो औरत गर्भवती ना होती तो
क्या उन्हें कोई शिनाख्त कर पाता?

कई सालों बाद
आज मैं फिर
तुम्हारे पास से गुजरा मनेरी
देखा तुम सब भूल गई हो
जहाँ कभी वह बस जली थी
और जले थे कई इंसान
वहाँ
तुम्हारी छाती पर
अब एक मंदिर खड़ा है
जिसमें बिराजा है
तुम्हारा भगवान!
और तुम रोज उसकी पूजा करते
दान-दक्षिणा बटोर रही हो
तुम्हें नहीं पता कि
वो पैंतीस लाशें किसकी थीं
कौन-कौन मरा था वहाँ
अब इससे तुम्हें क्या फर्क पड़ता है
तुम तो भजन-कीर्तन में तल्लीन हो
रह आओ...।

शब्दार्थ
  1. जिला मंडला (म.प्र.) का एक गाँव, जहाँ एक बस में दुर्घटना होते ही आग लग गई और उसमें सवार सैंतीस यात्रियों की जलने से मृत्यु हो गई थीं।