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नौकर / रंजना जायसवाल

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'कोई नौकर क्यों नहीं रख लेतीं
कोई गरीब बच्चा आराम हो जाएगा
ज्यादा लिख-पढ़ पाएँगी समय बचेगा
बचेगी ऊर्जा किसी बड़े को मत रखना
रख सकता है किसी रात गर्दन पर छुरी
स्त्री मिलेगी नहीं ईमानदार जरूरतमंद
रहेगा बच्चा ही ठीक
पहाड़ का हो तो और भी'
अक्सर मित्र सलाह देते हैं
सोचती हूँ मैं भी कि हो कोई ऐसा
सँभाल ले घर निश्चिंत होकर
कहीं आ-जा सकूँ
निपटा सकूँ बाहर के काम
सृजन करूँ और भी ज्यादा
पर ज्यों ही आता है सामने कोई बच्चा
मेरा मन जाने कैसा हो जाता है
यह काम करेगा मैं लिखूँगी-पढ़ूँगी
यह गुलाम होगा मैं आजाद
नहीं पच पाती मन को यह बात
हर बार मैं नौकर-विहीन रह जाती हूँ
और मित्रों में गरीब सोच की समझी जाती हूँ