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न मैं किसी का / केदारनाथ अग्रवाल

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जीकर भी
न जीने की संज्ञा से जीवित हूँ मैं
रुक गई नाव के हाथ थामे
प्रवाहित जल में
अप्रवाहित खड़ा मैं
अजनबी-अकेला-
न मैं किसी का
न कोई मेरा।
मौत जी रही है मुझे
जिंदगी के साथ
अपनी जिंदगी में

रचनाकाल: २०-१०-१९६६