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पद्य-शब्द-कोश: संरचनात्मक परिचय / शेषनाथ प्रसाद

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अरविंद कुमार के हिंदी थिसॉरस पर बहुत पहले प्रसिद्ध हिंदी साप्ताहिक ‘आजकल’ में छपे एक लेख पर मैंने अपनी प्रतिक्रिया छपवाई थी. उसमें मैंने लिखा था कि उनके हिंदी थिसॉरस के पूर्व सन् 1928 ई में ही थिसॉरस की परिभाषा सार्थक करनेवाली एक पुस्तक “पद्य-शब्द-कोश“ नाम से आ गई थी. उसके लेखक हैं सत्यनारायणसिंह वर्मा “हिंदी भूषण“ पर न तो उस लेख के लेखक ने इसका नोटिस न यह प्रतिक्रिया अरविंद कुमार जी तक ही पहुँच पाई.

संयोग से अरविंद जी अब मेरे फेसबुक मित्र हैं. अरविंद कुमार जी ने इसपर अपनी प्रतिक्रिया भी दी है: “अगर मुझे इन पुराने कोशों के बारे में पता होता तो भूमिका में उनका उल्लेख जरूर करता“

मुझे आवश्यक लग रहा है कि मैं हिंदी जगत को उक्त “पद्य-शब्द-कोश” का संरचनात्मक परिचय दूँ. सन् 1929 ई में आए इसके परिवर्द्धित और परिमार्जित दूसरे संस्करण को मैंने इसके संरचनात्मक परिचय का आधार बनाया है.

इसका संरचनात्मक परिचय देने के पहले मैं यह बताना चाहूँगा कि सन् 1952 ई तक हिंदी जगत में ‘ थिसॉरस ’ शब्द प्रचलित नहीं था. सन् 1952 ई में अपने एक मित्र के माध्यम से अरविंद कुमार प्रथमतः रोजट के अँग्रेजी थिसॉरस (सन् 1852 ई में प्रकाशित ) से परिचित हुए और पत्नी कुसुम के सहयोग से सन् 1978 - 98 ई में रचित अपना “ समांतर कोश “ प्रस्तुत कर हिंदी जगत में इसे मशहूर किया. लेकिन यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि थिसॉरस की अवधारणा हिंदी में पहले से थी. यह संस्कृत कोशकार अमर सिंह के अमरकोश “लिंगानुशासनम् “ के अनुक्रम में थी. मुझे याद आता है कि जब मैं पाँचवीं कक्षा (सन् 1955 ई) में था तब छात्रों से अमरकोश खरीदवाया जाता था और उसके श्लोक रटवाए जाते थे. मुझे अभी तक इसका एक श्लोक याद है: समाहृत्यानि (न्य) तंत्राणी संक्षिप्तै प्रतिसंस्कृतै. ऐसा छात्रों के शब्दों के पर्यायवाची शब्द-ज्ञान को बढ़ाने और अभीष्ट भाव के लिए उपयुक्त शब्द चुनने को प्रेरित करने के लिए किया जाता था. यह परंपरा बहुत पहले से चली आ रही थी. उस समय के छात्रों की परिवेशगत आवश्यकता के अनुसार वर्मा जी ने अपना “पद्य-शब्द-कोश” प्रकाशित करवाया. तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी भूरि भूरि प्रशंसा की. यह पाठ्यक्रम में तो नहीं था पर विहार के पूर्वमाध्यनिक विद्यालयों में खरीदवाया जाता था. तत्समय प्रकाशित प्रसिद्ध पत्र ‘विश्वामित्र’ की टिप्पणी देखिए-

“नए कवियों और विद्यार्थियों के लिए तो यह उपयोगी है ही, साथ ही हिंदी साहित्य के एक अंग (थिसॉरस ?) की इससे खासी पूर्ति होती है“ -भूमिका, पद्य-शब्द-कोश

संरचना

“पद्य-शब्द-कोश” की संरचना विश्व के प्रथम थिसॉरस ‘अमरकोश’ के ढर्रे पर है. ‘अमरकोश’ में पर्यायवाची श्लोकों में दिए गए हैं और “पद्य-शब्द-कोश” में पदों में. अमरकोश की रचना नए या प्रौढ़ताप्राप्त कवियों और विद्वानों के लिए की गई है पर “पद्य-शब्द-कोश” की रचना नए कवियों, लेखकों और पूर्वमाध्यमिक स्तर के छात्रों के लिए की गई है. ‘अमरकोश’ के विपरीत इसमें उन्हीं प्रमुख शब्दों के पर्यायवाची दिए गए हैं जो हिंदी जगत में बहुप्रचलित हैं और हिंदी लेखकों और कवियों द्वारा बहुतायत से प्रयोग में लाए जाते रहे हैं. पर्यायवाची शब्द भी बहुप्रचलित ही लिए गए हैं. इसमें अप्रचलित, अपरिचित और बीहड़ शब्दों को स्थान नहीं मिला है. कोश को पद्य में प्रस्तुत करने के पीछे उनका ध्येय है---

“हमारे प्राचीन ऋषियों-महर्षियों ने सभी विषयों के ग्रंथों को कविता में ही रच डाला है. व्याकरण, गणित, तर्क, नीति और ज्योतिष को कौन कहे इतिहास और कोश तक को कविता ही में बद्ध कर दिया है... उन्हीं आचार्यों के पवित्र सिद्धांत को आगे रख, मैंने भी इस छोटी सी पुस्तक को लिखने का दुस्साहस किया है“ –भूमिका, पद्य-शब्द-कोश

इसमें चुने गए शब्दों को वर्गों में नहीं बाँटा गया है न ही अमरकोश की तरह उनके नाम (संज्ञा) और लिंग को ही बताया गया है. इसमें कुल 290 शब्द अकारादिक्रम से इकट्ठे किए गए है जिसमें संज्ञा, विशेषण, स्त्रीलिंग, पुलिंग सभी तरह के शब्द हैं. ‘कोश ’ में इनका अलग से निर्देश नहीं है. 390 पदों में इनके पर्याय और पर्यायवाची दिए गए है. इसमें शब्दों के विपर्याय नहीं दिए हैं. हाँ स्थान स्थान पर शब्द के अनेकार्थ अवश्य दिए हैं. ये अनेकार्थ भी पदों में हैं.

कोश में पहले चुनी हुई सम्मतियाँ दी गई हैं, फिर भूमिका है, तदुपरि प्रमुख शब्दों का सूचीपत्र है.

सूचीपत्र

संख्या / शब्द / पृष्ठ संख्या

1 / श्रीगणेश / 1 2 / अग्नि / 2 3 / अर्जुन / 3 21 / इच्छा / 10 31 / कठोर / 14 55 / खराउँ / 24 290 / हृष्ट / 105

इसके बाद ‘शब्द‘, पदों में उसके पर्यायवाची और फिर अनेकार्थ दिए गए हैं. प्रारंभ मंगलाचरण से होता है. इसमें श्रीगणेश देवता के पर्यायवाची देने के व्याज से उनकी वंदना की गई है.

ये टिप्पणियाँ इस कोश में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं. लेखक का मत है-

“शब्दों पर टिप्पणियाँ इस अभिप्राय से दी गई हैं कि पाठक शब्दों के यथार्थ अर्थ को समझ सकें और अर्थानुसार उनका प्रयोग भी कर सकें“ –भूमिका, पद्य-शब्द-कोश

इन टिप्पणियों में ही शब्दों की व्युत्पत्ति, व्युत्पत्यर्थ तथा धातु और धात्वर्थ भी दर्शाए गए हैं. धातु और थात्वर्थ देने के संबंध में कोशकार का मत है-

“पुस्तक विस्तार के भय से सभी शब्दों के धातु नहीं दर्शाए जा सके हैं,...धात्वर्थ जानते हुए शब्द के प्रयोग से साहित्य का सौष्ठव कहीं अधिक बढ़ जाता है...तुलसीदास जी....ने शब्दों का प्रयोग बड़ी खूबी के साथ किया है-

तब चलेउ बाण कराल। फुंकरत जनु बहु व्याल॥

यह ‘बाण ‘ ‘बण ’ धातु से बना है जिसका धात्वर्थ है सरसराता हुआ चलना जैसे साँप फुफकारे.

छाड़े विपुल नाराच। लगे कटन विकट पिशाच॥

‘नाराच’ का व्युत्पत्यर्थ है, “नार-मनुष्यों का समूह, आ- चारो ओर से, चम्- खाना“. अर्थात जो तीर चारो ओर से घेरे मनुष्यों के समूह (शत्रुओं) का नाश कर दे”. “जब भगवान रामचंद्र को खरदूषण की सेना ने घेर लिया तब भगवान ने नराच छोड़ना आरंभ कर दिया“ -भूमिका, पद्य-शब्द-कोश

(उक्त दोनों के लिए देखें- शब्द संख्या 173 की टिप्पणी, पृष्ठ 62. )

शब्दों के नीचे दी गई इन टिप्पणियों में शब्दों की व्युत्पत्ति प्रक्रिया भी दी गई है. ‘अग्नि’ का पर्यायवाची है पावक. इसके नीचे दी गई टिप्पणी में निर्देशित है, पावक (पु- पवित्र करना)—पवित्र करने वाला. पावक शब्द पु से व्युत्पन्न है और दव दु (जलानेवाला) से व्युत्पन्न है. और इसीतरह अन्य कई शब्द बनते हैं. देखिए, ‘अग्नि’ के पर्यायवाची के नीचे दी गई टिप्पणी की छायाप्रति:

ये सूचनाएँ पूर्वमाध्यमिक स्तर के छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी हैं क्योंकि भाषा और उसके साहित्य की आधारशिला इसी समय रखी जाती है.

इन टिप्पणियों में किसी देवता के नाम पड़ने की अंर्कथाएँ भी दी गईं हैं. देखें, प्रथम शब्द “1-श्रीगणेश“ के पर्यायवाची नाम- द्वैमातुर. गणनायक, एकरदन, आखुग और कविवर बदन. टिप्पणी में वे पूरे प्रसंग/अंतर्कथाएँ दिए गए हैं जिनके कारण वे इन नामों से पुकारे गए. शब्द “49- कृष्ण“ के पर्यायवाची नामों को देखें, “केशव- (के+शव) जल में रहनेवाला. अथवा सूर्य चंद्र प्रकाशमान पदार्थों को ‘केश‘ कहते हैं और ये इन्हीं कृष्ण के हैं, अतः इनका नाम ‘केशव’ है“. इसका संस्कृत प्रमाण भी कोश में उद्धृत है. “हृषिकेश (हृषिक- इंद्री, ईश- स्वामी)“. शब्द “153- पार्वती“ का पर्यायवाची दुर्गा–दुर्ग नामक राक्षस को मारनेवाली, अपर्णा- पार्वती ने शिव के लिए तप करती हुई पत्तों तक का खाना छोड़ दिया था. अतः वह अपर्णा कहलाईं.

कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम उनकी विशेषताओं को परिलक्षित करते हैं. इन परिलक्षणों को भी टिप्पणियों में सँजोया गया है. शब्द “3-अर्जुन“ के पर्यायवाची नामों को लें. अर्जुन के कई नाम है. उन नामों के विशेक (विशेषता बतानेवाले तथ्य) टिप्पणी में संदर्भित है- जैसे, पार्थ- पृथु के वंश का, शव्यसाची- दायीं ओर झुककर बाण चलानेवाला, कपिध्वज- जिसकी ध्वजा पर महावीर हों. यही नहीं अन्य शब्दों के भी विशेषक संदर्भ दिए गए है. जैसे- शब्द “79-चंद्रिका“ का पर्यायवाची कौमुदी (कुमुद- चंद्र या कुमुद अर्थात कुमुदनी जिसमें खिलती है; कु- पृथ्वी, मुद- प्रसन्न करना).

इन अंतर्कथाओं और विशेषताओं के कारण पड़े नामों की जानकारियाँ छात्रों को उनकी संस्कृति से जोड़ती हैं.

कई शब्द ऐसे भी होते हैं जिनके पर्यायवाच्यर्थ संदर्भ बदलने से विशेष अर्थ देने लगते हैं. इसका भी इस कोश में निदर्श मिलता है. जैसे शब्द “4-अतिथि“ (न तिथि) का अर्थ है जो एक दिन से अधिक न रहे. इसका एक पर्यायवाची है ‘अभ्यागत‘, टिप्पणी में दिया है- अभ्यागत (अभि +आ +गम् +कृ) जो दूसरे की शरण में आए. शरण में आने पर एक दिन से अधिक भी ठहरा जा सकता है.

इसके साथ कोशकार ने व्यंजक शब्दों के व्यंजनार्थ को भी उद्वलित करने की चेष्टा की है. भूमिका में उन्होंने इसके संकेत भी दिए हैं ‘रस‘ शीर्षक में:

“इस पुस्तक के लिखने का यह एक मुख्य अभिप्राय है कि पाठक रसानुकूल शब्दों का प्रयोग कर सकें... मरीचि और मार्तंड ये दोनों शब्द सूर्य के पर्यायवाची हैं किंतु मरीचि में यदि तंत्री के तारों का मधुर झंकार है तो मार्तंड में मृदंग का प्रचंड एवं उद्दंड गर्जन ...शब्दों का प्रयोग करते समय इसका विचार अवश्य रखा जाए“. –भूमिका, पद्य-शब्द-कोश

अनेकार्थ

अनेकार्थ के संबंध में कोशकार का कहना है- “बहुत से शब्द कई अर्थों में व्यवहृत होते हैं और ऐसे

ही इस कोश में मिलेंगे. किंतु पाठकों की सुविधा की दृष्टि से महुत से शब्दों के अनेकार्थ पद्यबद्धरूप में दे दिए गए हैं”.

अभीष्ट शब्द ढूँढ़ना

“पद्य-शब्द-कोश“ से किसी शब्द के लिए अभीष्ट भाव वाला पर्यायवाची पाने के लिए पहले सूचीपत्र में उस शब्द को देखना होगा, फिर उस शब्द की संख्या और पृष्ठ उलटकर उसके पर्यायवाचियों में से अभीष्ट भाववाला पर्यायवाची ढूँढ़ लेना होगा.

परिशिष्ट

अभीष्ट शब्द ढूँढ़ने के लिए परिशिष्ट की भी सुविधा भी दी गई है इस संबंध में कोशकार का कहना है-

“प्रथम संस्करण केवल कवि तथा बालकों के याद करने के लिए ही बनाया गया था, अतः अन्यान्य कोशों की भाँति शब्दार्थ निकालने का काम उससे नहीं लिया जा सकता था, इस अभाव की पूर्ति इसबार परिशिष्ट देकर कर दी गई है“

जिस शब्द का पर्यायवाची ढूँढ़ना है उसे पहले परिशिष्ट में ढूँढ़ें. और उसके आगे दी गई संख्या वाले पन्ने को पलटें और पर्यायवाची प्रप्त कर लें.