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पहचानते हुए भी / नीरज दइया

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मैं गफलत में रहा
तुम लगा-लगा कर मुखौटे
रचते रहे
नित नए स्वांग ।

दूर रख कर सच से
सिद्ध किए तुमने स्वार्थ
और आज मैं
पहचानते हुए भी तुम्हें
तुम्हारे मुखौटे उतारने की बजाय
स्वयं मुखौटा लगाने की सोचता हूं ।

अनुवाद : स्वयं कवि द्वारा