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पहिल खण्‍ड / भाग 2 / बैजू मिश्र 'देहाती'

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चारू भाइमे प्रीति अथाह,
भए नहि सकए तकर अवगाहं
पढ़ि सब शस्त्र भेला सर्वज्ञ,
नीति रीत युद्धहुँ गुणज्ञं
सुत सबहक अनुपलखि ज्ञान,
नृप उर मुद रह जलधि समान।
पुत्र सभक प्रति प्रीति अगाध,
रहल नृपक उर सतत् अवाध।
मंगलमय वह सतत् वयार
राज्य प्रजा विच सुखक अपार।
बहुत वर्ष बीतल एहि रीति,
नृप उर उठल भविष्यक नीति।
भेलहुँ बृद्ध बहु राज्यक काज,
राम सम्हारथु बनि युवराज।
पहिने होमए हिनक बिवाह,
बनथि तखन राज्यक नरनाह।
मंत्रीगण गुरूजन समुदाए,
तत्क्षण सभकें लेलनि बजाए।
सुनल सभासद नृपक बिचार,
हर्षक रहलने पाराबार।
अनुमोदन सभ क्यो कए देल,
नृपतिक मन गद्गद् भए गेल।
ताही क्षाण अएला ततय, ऋषिवर विश्वामित्र।
ब्रह्म ऋषी रहितहुँ छला, तामस बहुल चरित्र।
शंकित मन रहितहुँ नृपति, उठला स्वागत हेतु।
उच्चासन बैसाए पुनि, पूजल ऋषि कुल केतु।
पूछल नृपति शुभागम कारण,
कहू करब मस्तक पर धारण।
राज्यक सब किछु अछि पग अर्पण,
चाहीजे किछु करब समर्पण।
ऋषि कएलनि निज मौनक भंग,
कहल सकल आगमन प्रसंग।
राक्षस करइछ बहु उत्पात,
बुझइछ नहि किछु नीतिक बात।
करइछ जप तप पूजन भंग
क्रूड़ पाशविक प्रवृतिक संग।
एतबहि नहि सुनुहे अवधेश,
खाइछ मांस ऋषि गणक अशेष।