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पहुँची हूँ मैं / प्रगति गुप्ता

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मेरे न चाहते हुए भी
उम्र के इस ढलते पड़ाव पर
सिर्फ तुम्हारी
आखिरी इच्छा को निभाने पहुँची हूँ मैं ...
तुम्हारे विदा लेने से पहले
तुमको विदा करने पहुँची हूँ मैं...
कपाट तुम्हारे कक्ष के
ज्यों ही खोले थे मैंने
मानो चिरप्रतीक्षित थी तुम्हारी आँखें
शायद मेरे ही आगमन के...
कुछ बूंदे बहा नीर की
बस एकटक मुझे
निहारती गई तुम्हारी आँखें...
कब ख़ामोश हुई धड़कन
और कब से कब तक
मैं निःशब्द मौन खड़ी
प्रतीक्षा करती रही तुम्हारे कुछ कहे की,
और गुज़र गई एक पूरी उम्र
हम दोनों की ही ...
मर्यादाओं में बसा प्रेम
सर्वदा मौन चिरप्रतीक्षित ही रहा,
रुबरु हुआ जब भी हमारा प्रेम
सजल नयन ये सर्वदा एक दूजे से मिला...
न कोई उलहाना न कोई
शिकायत की हमने
एक दूजे से ही कभी,
प्रेम का एक रूप ऐसा भी होता है
एक दूजे से मिलकर ही
पता चला तभी...
जितना गहरा तुम मुझमें
मैं तुम्हारे विचारों में उतरती गई
उतनी ही हमारी कही अनकही बातें
निःशब्द ही-
हमारे संग-संग चलती रही ...
सुदूर कहीं से तुम्हारा और मेरा
एक दूजे के लिए
उस परम से सलामती की दुआएँ पढ़ना
हम दोनों से कब छिपा था,
दोनों ने ही हरदम
बहते अश्रुओं के धारों पर
प्रेम का बाँध, बाँध कहीं
बहुत गहरे से,
एक दूजे को महसूसा था...
पूरी करने को सिर्फ़ तुम्हारी
अंतिम इच्छा आज
मैं तुम्हारे पास खड़ी थी...
देख तुम्हारी आँखों के
वो दो ढलके आंसू,
आज बाँध न पाई मेरी भी आँखें
उस बाँध को
जिस बाँध पर हम दोनों खड़े थे...
छोड़ कर तुम्हारा मुझे
कुछ यूं अकेले ही चले जाना
चिरपरिचित अनकहे प्रेम की
प्रतीक्षा का हिस्सा था
आज टूटते ही अनदिखी डोर हमारी
मुझे भी न जाने कब तक
नितांत अकेले ही
शेष जीवन यात्रा को,
पूर्ण अब करना था ...