भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

पानी गिरता / गिरीश पंकज

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पानी गिरता झर-झर-झर,
मोर नाचते फर-फर-फर ।
मेंढक उचक-उचक कर गाते-
गाना, सुन लो टर-टर-टर ।।

बिजली नाचे घूम-घूम कर,
पेड़ डोलते झूम-झूम कर ।
खुश हैं बादल, बाँटे पानी,
धरती माँ को चूम-चूम कर ।