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पिंड पँवारा / शब्द प्रकाश / धरनीदास

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250.

आदि अनादि युगादि युग, कर्त्ता अगम अपार।
सुरनर मुनि गंधर्व सब, पार न पावनिहार॥
श्री गुरु चरन सरन मन सच क्रम, जीवन प्रान-अधार।
प्रगट कहाँ कछु पिंड पँवारा, जस कछु जग व्यवहार॥
तातके बुन्द रकत जननी को, तेहि ते उपजी देह।
ता देही को चारि अवस्था, अंत होत पुनि खेह॥
बाल कुमार तरुन तरुमापन, अंत वृधापन राव।
पुनि तँह पाँच जना रस भोगी, एकहिँ एक न भाव॥
किछु दिन बीते चेत अचेते, मातु पिता दुलराव।
बोलन डोलन धावन लागे, राज बालपन पाव॥
रहसा रानी विहासा ने व। ज्वाला खवास बनाया जेव॥
पसरो बालापन को राज। काया गढ़ किहु साज समाज॥
गरे हँसुलिया मटिया हाथ। चूरा पैजनि चरनन साथ॥
कान छिदाओ सुनति कराय। अँगुठी मुँदरी अँगुठिन लाय॥
बाँधो माथ पाग लपटाय। करधन ऊपर काछ पेन्हाय॥
पाँव पनहिया लागे फंद। जमा जमोठी आठो बन्द॥
कटि पटुका भाँवर दुइ तीन। डारि पींजरा मैना कीन॥
बाभन मोलना राह बताव। दया धर्म नहि हृदय दृढ़ाव॥

विश्राम:

कुल व्यवहार पढ़ावन लगे, निशि दिन आठो याम।
परपंची परिवार सकल मिलि, परिहरि रामको नाम॥1॥

दिन दिन राजा भौ परचंड। लागे लेन प्रजासोँ दंड॥
प्रति दिन पात अखाड़े जाँहि। बल बड़साव भजो तन माँह॥
जोड़ा घोड़ा औ हथियार। घने पियादा औ असवार॥
कुत्ताा चिंता बहरी जाल। रखत तखत किहु लाल गुलाल॥
लागे देन दान बकसीस। जो आवै सो नावै सीस॥
बनी वावली बँगला बाग। नटी गुनी सुनिके सुख लाग॥
होने लागु बहुत इतभाम। सो पहुँचे जो लावै दाम॥
ठाम ठाम रहे डयेढ़ी दार। बहु बन्दी जन करहि कवार॥

विश्राम:

लाये ब्याहि पराई वैपर, बाढ़ो गर्व गुमान।
नीचा मन ऊँचा चढ़ि बैठो, बाजो विविध निशान॥2॥

जहाँ रहे तरुनायन राय। तहाँ खबर यह पहुँची जाय॥
बालप राज करै गढ़ माँहि। काहुकि शंका मानै नाँहि॥
औ ना काहु को नावै माथ। हमरे हुकुम पसारे हाथ॥
ताखन तरुनायन रिसियान। औ संग होते जो परधान॥
बोले अपनी सैन बुलाय। चलो चोख गढ़ देखो जाय॥
आप आपन करो समान। काल कि परसोँ करोँ पयान॥
के बपुरा बालापन राय। अब यह आनि बनो है दाव॥
जैसे चाँपे सींव हमारी। की धरि लेहु कि देहु विडारि॥

विश्राम:

दल बल साजि चढ़ै तरुनायन, चले निशान बजाय।
जा गढ़ होते राज बालपन, सो जनिकाने जाय॥3॥

लिखि परवाना दिया चलाय। हम तरुनायन अमरे आय॥
हम तुम बने न और उपाय। की रन चढ़ो कि जाय पराय॥
परिगो बालापन को सूझि। बरिया अबर बने नहि जूझि॥
बालप तबहिँ पयाना कीन। दरसन गढ़हिँ छोडि तब दीन॥
बालप राजा गये पराय। तरुनायन गढ़ पैठे धाय॥
प्रवला रानी प्रभुता नँव। ममता रहै रूवास जिलेव॥
काम क्रोध बल वुधि हँकार। भये अनंदित सब परिवार॥
दाढ़ी मोछ बगल कोपीन। करिया केस दमा दम कीन॥

विश्राम:

तरुनापन की फिरी दोहाई, दियो निशान बजाय।
भुगुतन लागे विविध विधि, हरिकि भगति विसराय॥4॥

विलखि बालपन तँह चलि जाय। जहाँ रहे विरधापन राय॥
सनमुख होइ कीनी फरियाद। सकहु तो लेहु हमारी दाद॥
राज छीन तरुनापन लीन। हमका देस-निकाला दीन॥
सिगरो राज पाट तुम लेहु छाजन भोजन हमका देहु॥
सुनि विरधापन करि सनमान। दियो दिलासा वीरा पान॥
वचन हमारो करो प्रमान। तरुनापन को करों निधान॥
कह राजा यह केतिक बात। करो पयाना होत परात॥
चलाँ साथ होइ देखाँ जाय। विधिहिँ सुदेवस धरो बनाय॥

विश्राम:

जोरि बटोरि सैन जत अपनी, औ जत मिले सहाय।
बालापन विरधापन हिलि मिलि, चले निशान बजाय॥5॥

चढु विरधापन बंब बजाय। गढ़ तरुनाय लियो नजिकाय॥
लिखि परवाना दियो चलाय। हम विरधापन अमरे आय॥
बालापन तुम दियो विडारि। अब हम तुमसाँ बाढ़ी रारि॥
जे मन भावै करहु उपाय। आय मिलहु कै जाहु पराय॥
सुनि तरुनायन उइे रिसाय। ना हम मिलब न जाब पराय॥
तरुनापन बाँधी तरुवारि। लरहि खेल चढ़ि हाँक प्रचारि॥
जूझहिँ दुहु-दिसि जूझनहार। एकहि एकन जीतनहार॥
जूझे काम क्रोध दोउ वीर। अहंकार को लागी तीर॥

विश्राम:

रोग व्याधि के गोला करि करि, किहु विरधापन मारि।
विचलन लागे कोट कँगूरा, चलु तरुनापन हारि॥6॥

जब तरुनापन पड़े सँकत। करिया केस भये सब सेत॥
नयनन मेटि गये उँजियार। श्रवन सनेही हाँक पुकार॥
नीके नाक सूँघ नहिँ वास। बात पित्त कफ लीन निवास॥
मुख नहि आवै साबित बात। इन्द्रिय थकीँ गिरे सब दाँत॥
डोलै माथ हाथ अरु पाव। थाके सुधि बुधि बल बौसाव॥
तरुनापन लीनो बनवास। गढ़ विधापन कीन निवास॥
अलसा रानी लालच नेव। खाँसी रहे खबास रिकेव॥
तरुना पन छोड़ा मैदान। विरधापन को बाजु निशान॥

विश्राम:

भेटो माल मताय जहाँ लगि, सो विरधापन लीन।
भागि गये राजा तरुना पन, बहुरि न फेरा कीन॥7॥

काया कोट वृधापन राऊ। कछु दिन आपन हुकुम चलाऊ॥
पलँग बछाय बैठु महराजा। जल परिजन साँ निब है काजा॥
जो कछु पावहिँ पहिरहिँ खाँहि। भक्ति न करी समुझि पछताँहि॥
पुनि उनहूँ को परो हँकार। ढहा कोट तब भौ निरुवार॥
छूटि गओ तब वाद विवाद। दुख सुख संपति विपति विषाद॥
यहि देही को यहै स्वभा। भावे रंक होय कै राव॥
जेते आवहिँ तेते जाँहि। जो उठि गया सो बुहरा नाहिँ॥
कोइ चलु बालक कोई जवान। कोइ विधापन कियो प्रयान॥

विश्राम:

भाव भक्ति जिय-दया दीनता, सबसे सील स्वभाव।
सको सो करो आज यहि अवसर, बहुरि न ऐसो दाव॥8॥

प्रेम प्रीति परमारथ करिले साँच वचन मुख भाखु॥
खैर बबूर धतूरकि वारी, फरै न दाडिम दाखु॥9॥

परमेश्वर को भक्ति पियारी, सब मिलि करो विचार।
हिन्दू तुरुक ओछाय छोय कुल, करै सो उतरै पार॥
दुर्लभ मानुष जन्म जगत मेँ, बिनु हरिनाम असार।
गरब गुमान करो मति कोई, धरनी दास पुकार॥
सुरमा साधु संत जन जेते, जिन हरिनाम अधार।
धरनी दास पँवरिया ताको, इत उत पार उतार॥