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प्यारे! कहा कहों मैं मन की / स्वामी सनातनदेव

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राग आसावरी, तीन ताल 10.7.1974

प्यारे! कहा कहों मैं मन की।
कहा छिपी है तुम सों प्रीतम! जानत हो सब जन की॥
कहा-कहा सोची या मनने, चली न एक जतन की।
जो तुम चही भई विनु कीन्हें, भई न पैज मनन की॥1॥
तरसत है मन दरस-परसकों, सो तो कठिन सुपन की।
तुम चाहो तो गीति गढ़ाई बढ़ि-बढ़ि बिना जतन की॥2॥
यह सब चहों न मैं मनमोहन! प्रीति देहु चरनन की।
ऐसी कृपा करहु जो सपनेहुँ, सुधि न होय या तन की॥3॥
केवल-केवल प्रीति तिहारी, लागे लगन भजन की।
रीति-नीति कोउ और न चाहूँ, चाह यही या मन की॥4॥
सब कछु लेहु देहु निज पद-रति-यही ललक बरसन की।
तुम ही दई तरस यह प्यारे! सरस करहु निज जन की॥5॥

शब्दार्थ