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प्यास जो बुझ न सकी उस की निशानी होगी / नूर जहाँ 'सरवत'

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प्यास जो बुझ न सकी उस की निशानी होगी
रेत पर लिक्खी हुई मेरी कहानी होगी

वक़्त अल्फाज़ का मफ़हूम बदल देता है
देखते देखते हर बात पुरानी होगी

कर गई जो मेरी पलकों के सितारे रौशन
वो बिखरते हुए सूरज की निशानी होगी

फिर अँधेरे में न खो जाए कहीं उस की सदा
दिल के आँगन में नई शम्मा जलानी होगी

अपने ख़्वाबों की तरह शाख़ से टूटे हुए फूल
चुन रही हूँ कोई तस्वीर सजानी होगी

बे-ज़बाँ कर गया मुझ को तो सवालों का हुजूम
ज़िंदगी आज तुझे बात बनानी होगी

कर रही है जो मेरे अक्स को धुँदला ‘सरवत’
मैं ने दुनिया की र्को बात न मानी होगी।