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प्रगति का घाव / राम सेंगर

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जबरा मारे
अबरा रोए ।

कौन अजान सुने मुर्गी की
राजा और न बख़्तरपोश ।
जहाँ जाएगी भेड़ मुड़ेगी
जाति भेड़ है इतना दोष ।
कथानकों में सच के निर्मम
पहलू सारे मथे-बिलोए ।

जबरा मारे
अबरा रोए ।

पत्थर नहीं कि जोंक न लागे
लग जो गई चूसती खून ।
वे क्या मारेंगे जोंकों को
जिनके घर में नमक न नून ।
बनी सनसनीखेज़ ग़रीबी
पूँजी ने सब नशे निचोए ।

जबरा मारे
अबरा रोए ।

घृणा खुन्स नँगई लुच्चई
कितने नए वीडियो गेम ।
गाँव लूट खाया चौकी ने
मिला लूट का किसको क्लेम
अपकर्मों का दमनचक्र है
सब हो जाए, सब कुछ होए ।

जबरा मारे
अबरा रोए ।

गुणी चुगद हैं, चुगद गुणी हैं
लँगड़ी भिन्नों के उलझाव ।
घोड़े मरे, गधे पॉवर में
सड़ने लगा प्रगति का घाव
विडम्बना के खेल निराले
दाग़ न छूटें, कितना धोए

जबरा मारे
अबरा रोए ।