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प्रथम प्रकरण / श्लोक 11-20 / मृदुल कीर्ति

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अष्टावक्र उवाचः
जो मुक्त माने ,मुक्त स्व को, बद्ध माने बद्ध है,
जैसी मति वैसी गति, किवंदंती ऐसी प्रसिद्ध है.---११

परिपूर्ण,पूर्ण है, एक विभु, चैतन्य साक्षी शांत है,
यह आत्मा निःस्पृह विमल , संसारी लगती भ्रांत है .---१२

यह देह मन बुद्धि अहम्, ममकार , भ्रम, है अनित्य हैं,
कूटस्थ बोध अद्वैत निश्चय , आत्मा ही नित्य है.---१३

बहुकाल से तू देह के अभिमान में आबद्ध है,
कर ज्ञान रूपी अरि से बेधन, नित्य तब निर्बद्ध है.---१४

निष्क्रिय निरंजन स्व प्रकाशित , आत्म तत्व असंग है,
तू ही अनुष्ठापित समाधी, कर रहा क्या विसंग है.---१५

यह विश्व तुझमें ही व्याप्त है, तुझमें पिरोया सा हुआ,
तू वस्तुतः चैतन्य, सब तुझमें समाया सा हुआ.---१६

निरपेक्ष अविकारी तू ही, चिर शान्ति मुक्ति का मूल है,
चिन्मात्र चिद्घन रूप तू, चैतन्य शक्ति समूल है .---१७

देह मिथ्या आत्म तत्व ही , नित्य निश्चल सत्य है ,
उपदेश यह ही यथार्थ, जग आवागमन, से मुक्त है.---१८

ज्यों विश्व में प्रतिबिम्ब अपने रूप का ही वास है,
त्यों बाह्य अंतर्देह में, परब्रह्म का आवास है.---१९

ज्यों घट में अन्तः बाह्य स्थित सर्वगत आकाश है,
त्यों नित निरंतर ब्रह्म का सब प्राणियों में प्रकाश है.---२०