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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / त्रयोदश सर्ग / पृष्ठ - २

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विडम्बना है विधि की बलीयसी।
अखण्डनीया-लिपि है ललाट की।
भला नहीं तो तुहिनाभिभूत हो।
विनष्ट होता रवि-बंधु-कंज क्यों॥21॥

'विभूतिशाली-ब्रज, श्री मुकुन्द का।'
निवास भू द्वादश-वर्ष जो रहा।
बड़ी-प्रतिष्ठा इससे उसे मिली।
हुआ महा-गौरव गोप-वंश का॥22॥

चरित्र ऐसा उनका विचित्र है।
प्रविष्ट होती जिसमें न बुध्दि है।
सदा बनाती मन को विमुग्ध है।
अलौकिकालोकमयी गुणावली॥23॥

अपूर्व-आदर्श दिखा नरत्व का।
प्रदान की है पशु को मनुष्यता।
सिखा उन्होंने चित की समुच्चता।
बना दिया मानव गोप-वृन्द को॥24॥

मुकुन्द थे पुत्र ब्रजेश-नन्द के।
गऊ चराना उनका न कार्य था।
रहे जहाँ सेवक सैकड़ों वहाँ।
उन्हें भला कानन कौन भेजता॥25॥

परन्तु आते वन में स-मोद वे।
अनन्त-ज्ञानार्जन के लिए स्वयं।
तथा उन्हें वांछित थी नितान्त ही।
वनान्त में हिंसक-जन्तु-हीनता॥26॥

मुकुन्द आते जब थे अरण्य में।
प्रफुल्ल हो तो करते विहार थे।
विलोकते थे सु-विलास वारि का।
कलिन्दजा के कल कूल पै खड़े॥27॥

स-मोद बैठे गिरि-सानु पै कभी।
अनेक थे सुन्दर-दृश्य देखते।
बने महा-उत्सुक वे कभी छटा।
विलोकते निर्झर-नीर की रहे॥28॥

सु-वीथिका में कल-कुंज-पुंज में।
शनै: शनै: वे स-विनोद घूमते।
विमुग्ध हो हो कर थे विलोकते।
लता-सपुष्पा मृदु-मन्द-दूलिता॥29॥

पतंगजा-सुन्दर स्वच्छ-वारि में।
स-बन्धु थे मोहन तैरते कभी।
कदम्ब-शाखा पर बैठ मत्त हो।
कभी बजाते निज-मंजु-वेणु वे॥30॥

वनस्थली उर्वर-अंक उद्भवा।
अनेक बूटी उपयोगिनी-जड़ी।
रही परिज्ञात मुकुन्द-देव को।
स्वकीय-संधन-करी सु-बुध्दि से॥31॥

वनस्थली में यदि थे विलोकते।
किसी परीक्षा-रत-धीर-व्यक्ति को।
सु-बूटियों का उससे मुकुंद तो।
स-मर्म्म थे सर्व-रहस्य जानते॥32॥

नवीन-दूर्वा फल-फूल-मूल क्या।
वरंच वे लौकिक तुच्छ-वस्तु को।
विलोकते थे खर-दृष्टि से सदा।
स्व-ज्ञान-मात्र-अभिवृध्दि के लिए॥33॥

तृणाति साधरण को उन्हें कभी।
विलोकते देख निविष्ट चित्त से।
विरक्त होती यदि ग्वाल-मण्डली।
उसे बताते यह तो मुकुन्द थे॥34॥

रहस्य से शून्य न एक पत्र है।
न विश्व में व्यर्थ बना तृणेक है।
करो न संकीर्ण विचार-दृष्टि को।
न धूलि की भी कणिका निरर्थ है॥35॥

वनस्थली में यदि थे विलोकते।
कहीं बड़ा भीषण-दुष्ट-जन्तु तो।
उसे मिले घात मुकुन्द मारते।
स्व-वीर्य से साहस से सु-युक्ति से॥36॥

यहीं बड़ा-भीषण एक व्याल था।
स्वरूप जो था विकराल-काल का।
विशाल काले उसके शरीर की।
करालता थी मति-लोप-कारिणी॥37॥

कभी फणी जो पथ-मध्य वक्र हो।
कँपा स्व-काया चलता स-वेग तो।
वनस्थली में उस काल त्रास का।
प्रकाश पाता अति-उग्र-रूप था॥38॥

समेट के स्वीय विशालकाय को।
फणा उठा, था जब व्याल बैठता।
विलोचनों को उस काल दूर से।
प्रतीत होता वह स्तूप-तुल्य था॥39॥

विलोल जिह्ना मुख से मुहुर्मुहु:।
निकालता था जब सर्प क्रुध्द हो।
निपात होता तब भूत-प्राण था।
विभीषिका-गर्त नितान्त गूढ़ में॥40॥