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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / द्वादश सर्ग / पृष्ठ - ३

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सुन गिरा यह वारिद-गात की।
प्रथम तर्क-वितर्क बड़ा हुआ।
फिर यही अवधरित हो गया।
गिरि बिना 'अवलम्ब' न अन्य है॥41॥

पर विलोक तमिस्र-प्रगाढ़ता।
तड़ित-पात प्रभंजन-भीमता।
सलिल-प्लावन-वर्षण-वारि का।
विफल थी बनती सब-मंत्रणा॥42॥

इसलिए फिर पंकज-नेत्र ने।
यह स-ओज कहा जन-वृन्द से।
रह अचेष्टित जीवन त्याग से।
मरण है अति-चारु सचेष्ट हो॥43॥

विपद-संकुल विश्व-प्रपंच है।
बहु-छिपा भवितव्य रहस्य है।
प्रति-घटी पल है भय प्राण का।
शिथिलता इस हेतु अ-श्रेय है॥44॥

विपद से वर-वीर-समान जो।
समर-अर्थ-समुद्यत हो सका।
विजय-भूति उसे सब काल ही।
वरण है करती सु-प्रसन्न हो॥45॥

पर विपत्ति विलोक स-शंक हो।
शिथिल जो करता पग-हस्त है।
अवनि में अवमानित शीघ्र हो।
कवल है बनता वह काल का॥46॥

कब कहाँ न हुई प्रतिद्व्न्दिता।
जब उपस्थित संकट-काल हो।
उचित-यत्न स-धर्य्य विधेय है।
उस घड़ी सब-मानव-मात्र को॥47॥

सु-फल जो मिलता इस काल है।
समझना न उसे लघु चाहिए।
बहुत हैं, पड़ संकट-स्रोत में।
सहस में जन जो शत भी बचें॥48॥

इसलिए तज निंद्य-विमूढ़ता।
उठ पड़ो सब लोग स-यत्न हो।
इस महा-भय-संकुल काल में।
बहु-सहायक जान ब्रजेश को॥49॥

सुन स-ओज सु-भाषण श्याम का।
बहु-प्रबोधित हो जन-मण्डली।
गृह गई पढ़ मंत्र-प्रयत्न का।
लग गई गिरि ओर प्रयाण में॥50॥

बहु-चुने-दृढ़-वीर सु-साहसी।
सबल-गोप लिये बलवीर भी।
समुचित स्थल में करने लगे।
सकल की उपयुक्त सहायता॥51॥

सलिल प्लावन से अब थे बचे।
लघु-बड़े बहु-उन्नत पंथ जो।
सब उन्हीं पर हो स-सतर्कता।
गमन थे करते गिरि-अंक में॥52॥

यदि ब्रजाधिप के प्रिय-लाडिले।
पतित का कर थे गहते कहीं।
उदक में घुस तो करते रहे।
वह कहीं जल-बाहर मग्न को॥53॥

पहुँचते बहुधा उस भाग में।
बहु अकिंचन थे रहते जहाँ।
कर सभी सुविधा सब-भाँति की।
वह उन्हें रखते गिरि-अंक में॥54॥

परम-वृध्द असम्बल लोक को।
दुख-मयी-विधवा रुज-ग्रस्त को।
बन सहायक थे पहुँचा रहे।
गिरि सु-गह्नर में कर यत्न वे॥55॥

यदि दिखा पड़ती जनता कहीं।
कु-पथ में पड़ के दुख भोगती।
पथ-प्रदर्शन थे करते उसे।
तुरत तो उस ठौर ब्रजेन्द्र जा॥56॥

जटिलता-पथ की तम गाढ़ता।
उदक-पात प्रभंजन भीमता।
मिलित थीं सब साथ, अत: घटी।
दुख-मयी-घटना प्रति-पंथ में॥57॥

पर सु-साहस से सु-प्रबंधा से।
ब्रज-विभूषण के जन एक भी।
तन न त्याग सका जल-मग्न हो।
मर सका गिर के न गिरीन्द्र से॥58॥

फलद-सम्बल लोचन के लिए।
क्षणप्रभा अतिरिक्त न अन्य था।
तदपि साधन में प्रति-कार्य्य के।
सफलता ब्रज-वल्लभ को मिली॥59॥

परम-सिक्त हुआ वपु-वस्त्र था।
गिर रहा शिर ऊपर वारि था।
लग रहा अति उग्र-समीर था।
पर विराम न था ब्रज-बन्धु को॥60॥