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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / नवम सर्ग / पृष्ठ - २

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देता था उसका प्रवाह उर में ऐसी उठी कल्पना।
धारा है यह मेरु से निकलती स्वर्गीय आनन्द की।
या है भूधर सानुराग द्रवता अंकस्थितों के लिए।
ऑंसू है वह ढालता विरह से किम्वा ब्रजाधीश के॥21॥

ऊधो को पथ में पयोद-स्वप्न सी गंभीरता पूरिता।
हो जाती ध्वनि एक कर्ण-गत थी प्राय: सुदूरागता।
होती थी श्रुति-गोचरा अब वही प्राबल्य पा पास ही।
व्यक्ता हो गिरि के किसी विवर से सद्वायु-संसर्गत:॥22॥

सद्भावाश्रयता अचिन्त्य-दृढ़ता निर्भीकता उच्चता।
नाना-कौशल-मूलता अटलता न्यारी-क्षमाशीलता।
होता था यह ज्ञात देख उसकी शास्ता-समा-भंगिमा।
मानो शासन है गिरीन्द्र करता निम्नस्थ-भूभाग का॥23॥

देतीं मुग्ध बना किसे न जिनको ऊँची शिखायें हिले।
शाखाएँ जिनकी विहंग-कुल से थीं शोभिता शब्दिता।
चारों ओर विशाल-शैल-वर के थे राजते कोटिश:।
ऊँचे श्यामल पत्र-मान-विटपी पुष्पोपशोभी महा॥24॥

जम्बू अम्ब कदम्ब निम्ब फलसा जम्बीर औ ऑंवला।
लीची दाड़िम नारिकेल इमिली औ शिंशपा इंगुदी।
नारंगी अमरूद बिल्व बदरी सागौन शालादि भी।
श्रेणी-बध्द तमाल ताल कदली औ शाल्मली थे खड़े॥25॥

ऊँचे दाड़िम से रसाल-तरु थे औ आम्र से शिंशपा।
यों निम्नोच्च असंख्य-पादप कसे वृन्दाटवी मध्य थे।
मानो वे अवलोकते पथ रहे वृन्दावनाधीश का।
ऊँचा शीश उठा अपार-जनता के तुल्य उत्कण्ठ हो॥26॥

वंशस्थ छन्द

गिरीन्द्र में व्याप विलोकनीय थी।
वनस्थली मध्य प्रशंसनीय थी।
अपूर्व शोभा अवलोकनीय थी।
असेत जम्बालिनि-कूल जम्बु की॥27॥

सुपक्वता पेशलता अपूर्वता।
फलादि की मुग्धकरी विभूति थी।
रसाप्लुता सी बन मंजु भूमि को।
रसालता थी करती रसाल की॥28॥

सुवर्तुलाकार विलोकनीय था।
विनम्र-शाखा नयनाभिराम थी।
अपूर्व थी श्यामल-पत्र-राशि में।
कदम्ब के पुष्प-कदम्ब की छटा॥29॥

स्वकीय-पंचांग प्रभाव से सदा।
सदैव नीरोग वनान्त को बना।
किसी गुणी-वैद्य समान था खड़ा।
स्वनिम्बता-गर्वित-वृक्ष-निम्ब का॥30॥

लिये हथेली सम गात-पत्र में।
बड़े अनूठे-फल श्यामरंग के।
सदा खड़ा स्वागत के निमित्त था।
प्रफुल्लितों सा फलवान फालसा॥31॥

सुरम्य-शाखाकल-पल्लवादि में।
न डोलते थे फल मंजु-भाव से।
प्रकाश वे थे करते शनै: शनै:।
सदम्बु-निम्बू-तरु की सदम्बुता॥32॥

दिखा फलों की बहुधा अपक्वता।
स्वपत्तिायों की स्थिरता-विहीनता।
बता रहा था चलचित्त वृत्ति के।
उतावलों की करतूत ऑंवला॥33॥

रसाल-गूदा छिलका कदंश में।
कु-बीज गूदा मधुमान-अंक में।
दिखा फलों में, वर-पोच-वंश का।
रहस्य लीची-तरु था बता रहा॥34॥

विलोल-जिह्वा-युत रक्त-पुष्प से।
सुदन्त शोफी फल भग्न-अंक से।
बढ़ा रही थी वन की विचित्रता।
समाद्रिता दाड़िम की द्रुमावली॥35॥

हिला-स्व-शाखा नव-पुष्प को खिला।
नचा सु-पत्रावलि औ फलादि ला।
नितान्त था मानस पान्थ मोहता।
सुकेलि-कारी तरु-नारिकेल का॥36॥

नितान्त लघ्वी घनता विवर्ध्दिनी।
असंख्य-पत्रावलि अंकधारिणी।
प्रगाढ़-छाया-मय पुष्पशोभिनी।
अम्लान काया-इमिली सुमौलि थी॥37॥

सु-चातुरी से किसके न चित्त को।
निमग्न सा था करता विनोद में।
स्वकीय न्यारी-रचना विमुग्ध हो।
स्व-शीश-संचालन-मग्न शिंशपा॥38॥

सु-पत्र संचालित थे न हो रहे।
नहीं-स-शाखा हिलते फलादि थे।
जता रही थी निज स्नेह-शीलता।
स्व-इंगितों से रुचिरांग इंगुदी॥39॥

सुवर्ण-ढाले-तमगे कई लगा।
हरे सजीले निज-वस्त्र को सजे।
बड़े-अनूठेपन साथ था खड़ा।
महा-रँगीला तरु-नागरंग का॥40॥