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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / नवम सर्ग / पृष्ठ - ५

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मालिनी छन्द

कलित-किरण-माला, बिम्ब-सौंदर्य्य-शाली।
सु-गगन-तल-शोभी सूर्य का, या शशी का।
जब रवितनया ले केलि में लग्न होती।
छविमय करती थी दर्शकों के दृगों को॥82॥

वंशस्थ छन्द

हरीतिमा का सु-विशाल-सिंधु सा।
मनोज्ञता की रमणीय-भूमि सा।
विचित्रता का शुभ-सिध्द-पीठ सा।
प्रशान्त वृन्दावन दर्शनीय था॥83॥

कलोलकारी खग-वृन्द-कूजिता।
सदैव सानन्द मिलिन्द गुंजिता।
रहीं सुकुंजें वन में विराजिता।
प्रफुल्लिता पल्लविता लतामयी॥84॥

प्रशस्त-शाखा न समान हस्त के।
प्रसारिता थी उपपत्ति के बिना।
प्रलुब्ध थी पादप को बना रही।
लता समालिंगन लाभ लालसा॥85॥

कई निराले तरु चारु-अंक में।
लुभावने लोहित पत्र थे लसे।
सदैव जो थे करते विवर्ध्दिता।
स्व-लालिमा से वन की ललामता॥86॥

प्रसून-शोभी तरु-पुंज-अंक में।
लसी ललामा लतिका प्रफुल्लिता।
जहाँ तहाँ थी वन में विराजिता।
स्मिता-समालिंगित कामिनी समा॥87॥

सुदूलिता थी अति कान्त भाव से।
कहीं स-एलालतिका-लवंग को।
कहीं लसी थी महि मंजु अंक में।
सु-लालिता सी नव माधवी-लता॥88॥

समीर संचालित मंद-मंद हो।
कहीं दलों से करता सु-केलि था।
प्रसून-वर्षा रत था, कहीं हिला।
स-पुष्प-शाखा सु-लता-प्रफुल्लिता॥89॥

कहीं उठाता बहु-मंजु वीचियाँ।
कहीं खिलाता कलिका प्रसून की।
बड़े अनूठेपन साथ पास जा।
कहीं हिलाता कमनीय-कंज था॥90॥

अश्वेत ऊदे अरुणाभ बैंगनी।
हरे अबीरी सित पीत संदली।
विचित्र-वेशी बहु अन्य वर्ण के।
विहंग से थी लसिता वनस्थली॥91॥

विभिन्न-आभा तरु रंग रूप के।
विहंगमों का दल व्योम-पंथ हो।
स-मोद आता जब था दिगंत से।
विशेष होता वन का विनोद था॥92॥

स-मोद जाते जब एक पेड़ से।
द्वितीय को तो करते विमुग्ध थे।
कलोल में हो रत मंजु-बोलते।
विहंग नाना रमणीय रंग के॥93॥

छटामयी कान्तिमती मनोहरा।
सु-चन्द्रिका से निज-नील पुच्छ के।
सदा बनाता वन को मनोज्ञ था।
कलापियों का कुल केकिनी लिये॥94॥

कहीं शुकों का दल बैठ पेड़ की।
फली-सु-शाखा पर केलि-मत्त हो।
अनके-मीठे-फल खा कदंश को।
गिरा रहा भू पर था प्रफुल्ल हो॥95॥

कहीं कपोती स्व-कपोत को लिये।
विनोदिता हो करती विहार थी।
कहीं सुनाती निज-कंत साथ थी।
स्व-काकली को कल कंठ-कोकिला॥96॥

कहीं महा-प्रेमिक था पपीहरा।
कथा-मयी थी नव शारिका कहीं।
कहीं कला-लोलुप थी चकोरिका।
ललामता-आलय-लाल थे कहीं॥97॥

महा-कदाकार बड़े-भयावने।
सुहावने सुन्दरता-निकेत से।
वनस्थली में पशु-वृन्द थे घने।
अनेक लीला-मय औ लुभावने॥98॥

नितान्त-सारल्य-मयी सुमुर्ति में।
मिली हुई कोमलता सु-लोमता।
किसे नहीं थी करती विमोहिता।
सदंगता-सुन्दरता-कुरंग की॥99॥

असेत-ऑंखें खनि-भूरि भाव की।
सुगीत न्यारी-गति की मनोज्ञता।
मनोहरा थी मृग-गात-माधुरी।
सुधारियों अंकित नाति-पीतता॥100॥