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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / पंचदश सर्ग / पृष्ठ - ७

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दृग अति अनुरागी श्यामली-मूर्ति के हैं।
युग श्रुति सुनना हैं चाहते चारु-तानें।
प्रियतम मिलने को चौगुनी लालसा से।
प्रति-पल अधिकाती चित्त की आतुरी है॥121॥

उर विदलित होता मत्त वृध्दि पाती।
बहु विलख न जो मैं यामिनी-मध्य रोती।
विरह-दव सताता, गात सारा जलाता।
यदि मम नयनों में वारि-धारा न होती॥122॥

कब तक मन मारूँ दग्ध हो जी जलाऊँ।
निज-मृदुल-कलेजे में शिला क्यों लगाऊँ।
वन-वन विलपूँ या मैं धंसूँ मेदिनी में।
निज-प्रियतम प्यारी मुर्ति क्यों देख पाऊँ॥123॥

तव तट पर आ के नित्य ही कान्त मेरे।
पुलकित बन भावों में पगे घूमते हैं।
यक दिन उनको पा प्रीत जी से सुनाना।
कल-कल-ध्वनि-द्वारा सर्व मेरी व्यथायें॥124॥

विधि वश यदि तेरी धार में आ गिरूँ मैं।
मम तन ब्रज की ही मेदिनी में मिलाना।
उस पर अनुकूला हो, बड़ी मंजुता से।
कल-कुसुम अनूठी-श्यामता के उगाना॥125॥

घन-तन रत मैं हूँ तू असेतांगिनी है।
तरलित-उर तू है चैन मैं हूँ न पाती।
अयि अलि बन जा तू शान्ति-दाता हमारी।
अति-प्रतपित मैं हूँ ताप तू है भगाती॥126॥

मन्दाक्रान्ता छन्द

रोई आ के कुसुम-ढिग औ भृङ्ग के साथ बोली।
वंशी-द्वारा-भ्रमित बन के बात की कोकिला से।
देखा प्यारे कमल-पग के अंक को उन्मना हो।
पीछे आयी तरणि-तनया-तीर उत्कण्ठिता सी॥127॥

द्रुतविलम्बित छन्द

तदुपरान्त गई गृह-बालिका।
व्यथित ऊद्धव को अति ही बना।
सब सुना सब ठौर छिपे गये।
पर न बोल सके वह अल्प भी॥128॥