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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / षोडश सर्ग / पृष्ठ - २

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प्रसून को मोहकता मनोज्ञता।
नितान्त थी अन्यमनस्कतामयी।
न वांछिता थी न विनोदनीय थी।
अ-मानिता हो मलयानिल-क्रिया॥21॥

बड़े यशस्वी वृष-भानु गेह के।
समीप थी एक विचित्र वाटिका।
प्रबुद्ध-ऊधो इसमें इन्हीं दिनों।
प्रबोध देने ब्रज-देवि को गये॥22॥

वसंत को पा यह शान्त वाटिका।
स्वभावत: कान्त नितान्त थी हुई।
परन्तु होती उसमें स-शान्ति थी।
विकाश की कौशल-कारिणी-क्रिया॥23॥

शनै: शनै: पादप पुंज कोंपलें।
विकाश पा के करती प्रदान थीं।
स-आतुरी रक्तिमता-विभूति को।
प्रमोदनीया-कमनीय श्यामता॥24॥

अनेक आकार-प्रकार से मनो।
बता रही थीं यह गूढ़-मर्म्म वे।
नहीं रँगेगा वह श्याम-रंग में।
न आदि में जो अनुराग में रँगा॥25॥

प्रसून थे भाव-समेत फूलते।
लुभावने श्यामल पत्र अंक में।
सुगंध को पूत बना दिगन्त में।
पसारती थी पवनातिपावनी॥26॥

प्रफुल्लता में अति-गूढ़-म्लानता।
मिली हुई साथ पुनीत-शान्ति के।
सु-व्यंजिता संयत भाव संग थी।
प्रफुल्ल-पाथोज प्रसून-पुंज में॥27॥

स-शान्ति आते उड़ते निकुंज में।
स-शान्ति जाते ढिग थे प्रसून के।
बने महा-नीरव, शान्त, संयमी।
स-शान्ति पीते मधु को मिलिन्द थे॥28॥

विनोद से पादप पै विराजना।
विहंगिनी साथ विलास बोलना।
बँधा हुआ संयम-सूत्र साथ था।
कलोलकारी खग का कलोलना॥29॥

न प्रायश: आनन त्यागती रही।
न थी बनाती ध्वनिता दिगन्त को।
न बाग में पा सकती विकाश थी।
अ-कुंठिता हो कल-कंठ-काकली॥30॥

इसी तपोभूमि-समान वाटिका।
सु-अंक में सुन्दर एक कुंज थी।
समावृता श्यामल-पुष्प-संकुला।
अनेकश: वेलि-लता-समूह से॥31॥

विराजती थीं वृष-भानु-नन्दिनी।
इसी बड़े नीरव शान्त-कुंज में।
अत: यहीं श्री बलवीर-बन्धु ने।
उन्हें विलोका अलि-वृन्द आवृता॥32॥

प्रशान्त, म्लाना, वृषभानु-कन्यका।
सु-मुर्ति देवी सम दिव्यतामयी।
विलोक, हो भावित भक्ति-भाव से।
विचित्र ऊधो-उर की दशा हुई॥33॥

अतीव थी कोमल-कान्ति नेत्र की।
परन्तु थी शान्ति विषाद-अंकिता।
विचित्र-मुद्रा मुख-पद्म की मिली।
प्रफुल्लता - आकुलता - समन्विता॥34॥

स-प्रीति वे आदर के लिए उठीं।
विलोक आया ब्रज-देव-बन्धु को।
पुन: उन्होंने निज-शान्त-कुंज में।
उन्हें बिठाया अति-भक्ति-भाव से॥35॥

अतीव-सम्मान समेत आदि में।
ब्रजेश्वरी की कुशलादि पूछ के।
पुन: सुधी-ऊद्धव ने स-नम्रता।
कहा सँदेसा वह श्याम-मूर्ति का॥36॥

मन्दाक्रान्ता छन्द
प्राणाधारे परम-सरले प्रेम की मुर्ति राधे।
निर्माता ने पृथक तुमसे यों किया क्यों मुझे है।
प्यारी आशा प्रिय-मिलन की नित्य है दूर होती।
कैसे ऐसे कठिन-पथ का पान्थ मैं हो रहा हूँ॥37॥

जो दो प्यारे हृदय मिल के एक ही हो गये हैं।
क्यों धाता ने विलग उनके गात को यों किया है।
कैसे आ के गुरु-गिरि पड़े बीच में हैं, उन्हीं के।
जो दो प्रेमी मिलित पय औ नीर से नित्यश: थे॥38॥

उत्कण्ठा के विवश नभ को, भूमि को, पादपों को।
ताराओं को, मनुज-मुख को प्रायश: देखता हूँ।
प्यारी! ऐसी न ध्वनि मुझको है कहीं भी सुनाती।
जो चिन्ता से चलित-चित की शान्ति का हेतु होवे॥39॥

जाना जाता परम विधि के बंधनों का नहीं है।
तो भी होगा उचित चित में यों प्रिये सोच लेना।
होते जाते विफल यदि हैं सर्व-संयोग सूत्र।
तो होवेगा निहित इसमें श्रेय का बीज कोई॥40॥