भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

फड़फड़ाना / रामेश्वर दयाल श्रीमाली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तुम्हारे लोह-पिंजर में
मैं तो सिर्फ फड़फड़ाया था
तुम ने तो उसी को समझ लिया
                 बगावत
और काट ली मेरी गर्दन !

यह तो अच्छा हुआ
जो मौत की गंध जानता है
वह नहीं फसेगा
अब तुम्हारे पिंजरों में !

काट लो गर्दन
खुशी से काटो
शांति है मेरे मन को
गदर्न के कट जाने से !
कारण ?
बंद नहीं होगा
पिंजरों में पंछियों का फड़फड़ाना
जब तक मिट नहीं जाती
पिंजरों में फांसने की यह परंपरा !

अनुवाद : नीरज दइया