भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए / बृज नारायण चकबस्त

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फ़ना[1] नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए
बहार आलमे फ़ानी[2] रहे रहे न रहे ।

जुनूने हुब्बे वतन[3] का मज़ा शबाब[4] में है
लहू में फिर ये रवानी रहे रहे न रहे ।

रहेगी आबोहवा[5] में ख़याल की बिजली
ये मुश्त ख़ाक[6] है फ़ानी रहे रहे न रहे ।

जो दिल में ज़ख़्म लगे हैं वो ख़ुद पुकारेंगे
ज़बाँ की सैफ़ बयानी[7] रहे रहे न रहे ।

मिटा रहा है ज़माना वतन के मन्दिर को
ये मर मिटों की निशानी रहे रहे न रहे ।

दिलों में आग लगे ये वफ़ा का जौहर[8] है
ये जमाँ ख़र्च ज़बानी रहे रहे न रहे ।

जो माँगना हो अभी माँग लो वतन के लिए
ये आरज़ू की जवानी रहे रहे न रहे ।

शब्दार्थ
  1. मृत्यु
  2. नाशवान संसार
  3. स्वदेश प्रेम का उन्माद
  4. जवानी
  5. जलवायु
  6. मुट्ठी भर मिट्टी
  7. कथन-शक्ति
  8. गुण