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बढ़ने लगे हैं ज़ेहन में खदसात किस क़दर / सिया सचदेव

बढ़ने लगे हैं ज़ेहन में खदसात किस क़दर
मजबूर कर गए मेरे हालात किस क़दर

हैवानियत की सारी हद्दे पार कर गए
थी ज़ेहन पर सवार खुराफात किस क़दर

आखिर हयात हार गयी जंग मौत से
थे सख्त दामिनी पे वो हालात किस क़दर

मत पूछ मुझसे मेरी उदासी का यूं सबब
कर देंगे शर्मसार सवालात इस क़दर

इंसानियत भी मुंह को छिपाए है इन दिनों
होने लगे वतन में फ़सादात किस क़दर

ए दिल मुझे संभाल,जरा सब्र दे मुझे
 भड़का रहे है मुझको ये जज़्बात किस क़दर

कोई तो हो जो बात का मेरी जवाब दे
खुद से करुँगी मैं भी भला बात किस क़दर