भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बल्लू मोटा / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बल्लू मोटा , ना है खोटा
रखे हाथ में , मोटा सोटा।
रोज़ नहाता ,भर-भर लोटा।

चन्दू भाई, है हलवाई
खुद ना खाता, कभी मिठाई।
इसीलिए कोठी बनवाई ।
माधो मट्टू, बड़ा निखट्टू
आदत से है , अड़ियल टट्टू।
सिर है उसका , जैसे लट्टू।

है बरजोरा , बड़ा चटोरा
खाता खीर बाइस कटोरा।
तन है उसका , जैसे बोरा।
-0-