भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बहुत तारीक सहरा हो गया है / नोशी गिलानी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बहुत तारीक सहरा हो गया है
हवा को शोर गहरा हो गया है

किसी के लम्स का ये मोजज़ा है
बदन सारा सुनहरा हो गया है

ये दिल देखूँ कि जिस के चार जानिब
तिरी यादों का पहरा हो गया है

वही है ख़ाल-ओ-ख़द में रौशनी सी
पे तिल आँखों का गहरा हो गया है

कभी उस शख़्स को देखा है तुम ने
मोहब्बत से सुनहरा हो गया है