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बादल / मिख़ाइल लेरमन्तफ़ / मदनलाल मधु

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आसमान में बादल, अथक चिरन्तन राही
नीली स्तेपी, आभा मोती जैसी पाई,
मुझ निर्वासित जैसे तुम भी दौड़े जाते,
प्यारे उत्तर से दक्षिण को पंख हिलाते।

तुम्हें भगाता कौन? भाग्य का निष्ठुर चक्कर?
छिपी जलन? या खुले द्वेष की निर्मम टक्कर?
सज़ा किसी अपराध बड़े की तुमने पाई?
या कि विषैली मित्रों ने जा चुगली खाई?

नहीं, व्यर्थ विस्तारों ने ही तुम्हें उबाया...
तुम पीड़ा अनभिज्ञ, न जानो ममता, माया,
सदा भावनाहीन, मुक्त तुम सदा-सदा को,
नहीं तुम्हारा वतन, न उस से निर्वासित हो।
 
मूल रूसी से अनुवाद : मदनलाल मधु

और अब यह कविता मूल रूसी भाषा में पढ़ें

                     ТУЧИ

Тучки небесные, вечные странники!
Степью лазурною, цепью жемчужною
Мчитесь вы, будто как я же, изгнанники
С милого севера в сторону южную.
Кто же вас гонит: судьбы ли решение?
Зависть ли тайная? злоба ль открытая?
Или на вас тяготит преступление?
Или друзей клевета ядовитая?
Нет, вам наскучили нивы бесплодные...
Чужды вам страсти и чужды страдания;
Вечно холодные, вечно свободные,
Нет у вас родины, нет вам изгнания.