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बापू अबै न आए! / सन्तोष सिंह बुन्देला

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ओरी बापू अबै न आए,
अबै लौ खैबे कछू न ल्याए,
सुनत दृग माता के भर आए, बोली तनिक लाल गम खाव,
बेई करै का तीन दिना सें, परै न कछू उपाव,

बचन माता कए हैं।
अबइयाँ बे भए हैं।।

कोड़ी-काड़ परो है जाड़ौ, तन पै उन्ना नइयाँ,
अब तौ उनकी लाज-बचइया, तुम हौ राम गुसइयाँ,

ऊसइँ रातैं हतो बुखार-
उनैं, फिर भारी परो तुसार,

मरे खाँ मारत है करतार, भँजा रओ जनम-जनम के दाव।
तरा ऊमैंसें गए ते छोड़ कातते ल्याय सिंगारे तोड़,

तला के चोरी सें,
चाहे सैजोरी सें।।

भँुसारौ हो गओ, छुटक गई, गेरऊँ-गेर उरइयाँ,
जानें काए तुमाए बापू, आए अबै लौ नइयाँ,
बहन लागो आँखन सें नीर,
छूट रओ माँ-बेटा कौ धीर,

ओरी चली तला के तीर, उतइँ कछु पूँछौ पतौ लगाव।
माए बापू भर आ जाय ँ, हम ना खैबे कभउँ मगायँ,
चलौ माता चलिए,
पतौ उनकौ करिए।।

गतिया बाँध दई पटका की, लरकै करो अँगारें,
चिपका लए हाँत छाती सें, खुद निग चली पछारें,
पूछन लागी नायँ और मायँ,
कछू आपस में लोग बतायँ,

तौ बड़कै पूछो मात अगायँ, ”भइया साँची बात बताव।
करत हौ तुम जा कीकी बात मोरौ जियरा बैठो जात,
बता दो साँसी-सी,
लगी है गाँसी-सी।“

”आज तला के पार डुकरिया मर गओ एक बटोई,
परदेसी-सौ लगत संग मैं ऊके नइयाँ कोई,
सिँघारे लएँ तनिक-से संग,
ककुर गओ है जाड़े में अंग,

तन को पर गऔ नीलौ रंग” सुनतन लगो करेजें घाव।
जाकें चीन्हीं पति की लास, मानौ टूट परो आकास,
झमा-सौ आ गओ है,
अँधेरौ छा गओ है।।

”कितै छोड़ गए बापू मोखाँ, तुम काँ जातों मइया“
गेरउँ गेर हेर कै रोबै मनौ अबोध लबइया,
थर-थर काँपै और चिल्लाय,
हतो को जो ऊखाँ समझाय?

देख दुख धरती फाटी जाय, देख दुख दुख कौ टूटौ चाव।
जौ लौ खुले मात कै नैन, बाली लटपट धीरे बैन,
‘न बेटा घबराओ,
आओ एंगर आओ।।

”बापू नें तौ मौखाँ छोड़ो, मैं तोय छोड़ चली हौं,
तोरे नाजुक हाथ लाड़ले, अब मैं सौपौं कीहौं?
माँ धरती, बापू आकास,
तुमारे, करौ उनइँ की आस,“

जौ लौ बाबा ईसुरदास आ गये, बोले, ना घबराव।
उठा कै बालक बाले, ”मात, करौ ना चिन्ता कौनउँ, भाँत,
न दुख हूहै ईहौं,
कै जौ लौ मैं जी हाँ।।“