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बार्डर पर किसान: दो कविताएँ / कौशल किशोर

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1,
जय जवान, जय किसान के देश में
जवान और किसान दोनों की जगह
अब बार्डर पर है

किसान खेत से निकले, गांव-गली-मोहल्लों से
घर-परिवार, बाल-बच्चों के साथ
ट्राली-ट्रैक्टर पर सवार
चल पड़े उनके कदम राजधानी की ओर

किसानों ने कभी नहीं सोचा था कि
उन्हें आक्रान्ता समझ बार्डर पर
इस तरह रोक लिया जायेगा
ठण्ड के इस मौसम में जब रक्त जमा जा रहा हो
उनका स्वागत पानी की तेज धार से किया जायेगा
उनका सामना कंटीले तारों और बोल्डरों से होगा
उन्हें झेलने होंगे गैस के गोले

किसान पहुँचना चाहते थे राजधानी
अपनी दरख्वास और दावों के साथ
यह उनका दूसरा घर था
उनके लिए प्यार की जगह थी
दिल्ली तो उनके दरवाजे पर थी
वही दिल्ली उनसे दूर हो गयी
दिल वाली कही जाने वाली दिल्ली
बदली-बदली थी

किसानों का कहना है कि
हमने चुनी है यह सरकार
फिर वह कैसे दे सकती है आजादी कंपनियों को
कि वे आयें और कब्जा जमायें हमारे खेत-खलिहानों पर
अनाज व गोदामों पर
और नीलाम करें दुनिया की मंडियों में
हम अपने ही खेत पर हो जायें मजूर
और बच्चे हो जायें सुख-सपनों से दूर

सरकार अपने होने का अधिकार जताती है
वह आरोप के अन्दाज में कहती है
किसान तो भोले-भाले, गाय की तरह सीधे-सादे
ये किसान नहीं, इनकी भाषा किसान की नहीं
यह तो शैतान की जबान है
बहुरूपिए घुस आये हैं इनके बीच

किसान भी पलटवार में पीछे नहीं
सरकार को जो कहना है, वह कहे
उसके आगे जाकर भी कहे, फिक्र नहीं
हम हैं जो 'कभी न छोड़ैं खेत'
हम तो हैं डट जाने वाले
यह धरती हमारी माँ है
तीस क्या, तीन सौ जाने चली जाय
शहीद होना हमारी परम्परा में है

ऐसी ही जिद्द है किसानों की
जिस पर वे अड़े हैं
यह उनकी जिद्द ही है जिस पर आज
टिकी है लोगों की उम्मीद
टिका है देश का जनतंत्र!

2,
कुछ भी अचानक नहीं होता
वह अकारण भी नहीं होता

उनके जीवन में एक नहीं अनेक बार्डर हैं
बार्डर ही बार्डर हैं
इन्हीं को लांघते-फलांगते पहुँचे हैं

वे रोटियों की तरह सेंके गये हैं
उनके नाम पर पूड़ियाँ तली गई हैं
वे बैलों की तरह जोते गये हैं
भेड़ बकरियों की तरह हांके गये हैं
उनकी पीठ सीढियाँ बनी हैं
जिसके सहारे कुछ विराजमान हैं मंच पर

यह उनका जीवन है या पानी ही पानी है
उसी में डूबे हैं, यह तो डूबने की कहानी है
किसी का घुटना डूबा है तो किसी की कमर
वह डरा है इसलिए कि गर्दन डूबने वाली है

सामने जो पेड़ है वहाँ वे मिलेंगे लटके हुए
घर की छत ने भी उन्हें मुक्त किया है
मुक्ति ही जीवन की राह है
उन्होंने खोज ली हैं मुक्ति की अनेक राहें
जिस पर चलते हुए कई उम्र पार की है
इस पार को पार करते हुए पहुँचे हैं आर पार तक

मस्तिष्क भन्नाया है, मन अशान्त है
दिल जख्मी है, पैर लहूलुहान है
इन्हीं पैरों से वे पहुँचे हैं और उन्हें नजर नहीं आते

वे बिसलरी की बोतल, बर्गर, पिज्जा नहीं हैं।