भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बाह रे बजार / गोविन्द झा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हमरे एक भाइ
गेल’छि बिकाइ
ने घुठिआ नांगड़ि ने मुठिया सींघ
ने तेहन खूट आ ने तेहन बान्ह
पाँचे मन लदबै तँ छीपि लेत कान्ह
तैओ गनि देलकैए सरूपलाल साहु
टाका दू हजार
बाह रे बजार
बाह हमर भाइ
गेलह तों बिकाइ
पड़ले रहि गेलहुँ हम टुकटुक तकैत
अपन प्रशंसा खूब अपनहि ढकैत
अपन जिनगीक दाम अपनहि अँकैत
पड़ले रहि गेलहुँ हम
बूझल नहि नबका बजारक किछु मर्म
लोढ़ासँ लिखलनि मने ब्रह्मा हमर कर्म
धन्य तोहर भाग, मीत गेलह तों बिकाइ
ईर्ष्या कए होएत की ? भोग होअह भाइ
गेलह तों बिकाइ
नित्य उठि भोरे अपन हाथें सहुआनि
स्नहेसँ खोअओथुन माँड़-गूरा-सानि-सानि
खाइ भरि पेट पीबि भरि छाक पानि
घंटी टनटनबैत गरदनिकें तानि
सुखसँ कटैत जएबह जिनगीक बाट
पड़ले रहि गेलहूँ हम, उसरि गेलै हाट
बाह रे बजार
एकसर हमही टा नाहि, हजारक हजार
हमरा-सन अभागल पड़ले रहि गेल
बाह रे बजार, छौक अजब तोहर खेल
केहन भेल काल
कतहु नहि भेटैए एको टा लेबाल
करू कोन उपाय आब ? कण्ठ फाड़ि चिकरू ?
लोक सभ, सुनैत जाह हम छी बिकरू।
दू गोट टांग अछि दू गोट हाथ
कम्पयुटर तुल्य अछि एक गोट माथ
पेटहि पर तैओ रहल छी बिकाइ
सुनै जाह लोक सभ, हम छी बिकरू
तैओ नहि अबैए केओ, आब कते चिकरू
बेचै छी कर्म अपन, बेचै छी देह
पेटक लेल बेचै छी अपन सभ स्वत्व
पेटक लेल ओढ़ै छी स्वेच्छासँ दासत्व
कीनि लैह केओ, बना लैह दास
राखि दैन्ह कान्ह पर जूआ, छीपब नहि कान्ह
आ कि बान्हि दैह खुट्टामे
फेकि दैह आगाँमें एक मुट्ठी घास
जीवनमे एतबे टा अछि अभिलास
बनबह गुलाम आह उनटल इतिहास
पेटहि पर बिका रहल अछि कतेक दास
केहन भेल काल
तैओ नहि भेटै एको टा लेबाल
बाह रे बजार
पड़ले रहि गेलहुँ हम टुकटुक तकैत
अपनी जिनगीक दाम अपनहि अँकैत
अपन गौरव-गाथा अपनहि ढकैत।