यह सिर्फ एक खबर है
बीतने की
अब अफसोस कैसा और किस बात का
हँसी के साथ ही वह स्त्री विलीन हो गई
प्रेम की गलियों में
दुपहर कैसी गरम थी
दूर से हवा आती थी बारिश के दिनों जैसी
लेकिन आसमान में कोई बादल नहीं
नहीं, ये बारिश के दिन नहीं है
एक परछाई के पिछे
रोशनी के जितने दिन आयें
चलें उतने दिन
वहाँ वह स्त्री मिल तरंगवती नदी की तरह
बहुत सा सामान है छत पर
कपड़े वहीं सूख रहे हैं
हवा में उड़ते, ओझल
कल जो धुँधलके की कहानी
जरा लम्बी हो गई थी उसे छोटी करनी है
विश्वास करने जैसी
यही सब है
बीतने की खबर के पहले।