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बीत गए युग दीप जलाते / त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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बीत गए युग दीप जलाते
कब तक दीप जलायें?

विजय-पर्व के भ्रम में जीकर
बीती उम्र हमारी,
मिलती रही हमें पग-पग पर
घुटन और लाचारी,
इन्तजार है, अपने द्वारे
सुख की आहट पायें।

आशाओं के दीप जलाये
घर-आँगन-चौबारे,
अंधकार की सत्ता जीती
हम सदैव ही हारे
जीतेंगे हम, शर्त एक है
स्वयं दीप बन जायें।

मन की काली घनी अमावस
होगी ख़त्म किसी दिन,
उम्मीदों की चिड़ियाँ
आँगन में गायेंगी पल-छिन,
आओ, स्वागत करें भोर का
मंगल-ध्वनियाँ गायें।