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बुलबुलों की लड़ाई / नज़ीर अकबराबादी

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कल बुलबुलें जो नौ दस क़ाबू में अपने आई।
उसमें से दो पकड़ कर कुश्ती में धर भिड़ाई।
यह शोर सुनके ख़ल्क़त[1], दौड़ आई दाईं बाईं।
कोई बोला ‘वाह हज़रत’ कोई बोला ‘वाह साईं।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥1॥

दस में तो दोनों कट कट लड़ती थीं करके गड्डा।
जब तीसरी को छोड़ा फिर तो हुआ तिगड्डा।
ख़ल्क़त भी आके टूटी, छोड़ अपना अपना अड्डा।
कड़की किसी की पसली टूटा किसी का हड्डा।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥2॥

थी तीन की यह कुश्ती चौथी को उसमें छोड़ा।
उसने तो ख़म बजाकर तीनों को धर झंझोड़ा।
फिर तो यह फटका आकर इन कुश्तियों का कोड़ा।
छूटा किसी का हाथी, भागा किसी का घोड़ा।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥3॥

एक कंकरी जो मारी पढ़ हमने फिर फ़ुसूं की।
कुश्ती में गठरी बंध गई उन चारों बुलबुलों की।
सुन सुन के चीखे़ उनकी लड़ने में ग़र्रगू़ं की।
सब बोले वाह हज़रत अच्छी यह पढ़के फूंकी।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥4॥

सुन सुनके चीखे़ं उनकी चिड़ियां जो चूं चूं आईं।
कौए पुकारे ग़ां ग़ां चीलें भी चिलचिलाईं।
सारद बटेर, मैना, चिमगादड़े भी आई।
मुर्गों ने कुकडूं कूं की, गलगलियाँ फड़फड़ाईं।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥5॥

चिल्लाए मोर, सारस और फड़फड़ाए घग्गू।
गिद और चुग़द दहाड़े और फड़फड़ाए उल्लू।
कुत्ते भी भौंके भौं भौं, गीदड़ पुकारे हू-हू।
भड़वे गधे भी रेंके, कर अपनी ढेंचू-ढेूंचू।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥6॥

जब ले चले वहां से हम बुलबुलों का लश्कर।
सब लोग हंस के बोले उस दम दुआएं देकर।
सब में मियां ”नज़ीर“ अब तुम हो बड़े क़लन्दर।
यह खेल आगरे में अब ख़त्म है तुम्हीं पर।
सौ सौ तरह की धूमें एक दम में कर दिखाई।
इस ढब से हमने यारो कल बुलबुलें लड़ाई॥7॥

शब्दार्थ
  1. जनता