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बूँद भर पानी नहीं था फिर भी कश्ती चल रही थी / डी. एम. मिश्र

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बॅूद भर पानी नहीं था फिर भी कश्ती चल रही थी
अज़्म था मेरा जवाँ पर ज़िंदगानी ढल रही थी

दूध पीती जा रही थी वो भरोसे का हमारे
क्या पता था एक नागिन आस्तीं में पल रही थी

दोस्तो ऐसा नज़ारा आपने देखा न होगा
सामने था मैं खड़ा मेरी चिता ही जल रही थी

कल तलक वह ज़िंदगी बनकर पड़ी रहती थी पीछे
अब मेरी दस्तक भी दरवाजे पे उसको खल रही थी

ज़िंदगी भर जिस नदी की धार में बहते रहे हम
वह समंदर की चहेती थी हमें बस छल रही थी

उस समय सूरज नहीं निकला था कोई देख पाता
चाँदनी चेहरे पे जब कालिख हमारे मल रही थी