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बेला, जुही, चमेली, चम्पा, हरसिंगार लिख दे / डी. एम. मिश्र

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बेला,जुही, चमेली, चम्पा, हरसिंगार लिख दे
कैसे कोई शायर पतझर को बहार लिख दे

उसको ख़ुदा ने आँखें दी हैं तो क्या इसीलिए
उड़ती हुई धूल को सावन की फुहार लिख दे

जिसने ठान लिया हो रस्ते से पहाड़ हट जाय
उस चींटी के नाज़ुक दिल को बेक़रार लिख दे

इक बँधुआ मजदूर के मुँह में जु़बाँ कहाँ होती
फिर भी इस खा़मोशी को उसकी गुहार लिख दे

जिस कविता में अपना समय, समाज न दिखता हो
उस को चाहे तो कवि के मन का ग़ुबार लिख दे

यह वह क़लम है जिसमें सच की स्याही छलक रही
एक लुटेरे को कैसे ईमानदार लिख दे

पुरस्कार की रेखा नहीं है मेरे हाथों में
मेरे स्वाभिमान को मेरा पुरस्कार लिख दे