मदारी डुगडुगी बजाकर
उल्लास बांट रहा है
मोटी कमाई की संभावना से
जितना उल्लसित है मदारी
उतना ही पीड़ित वह
जो ससुराल जाने के लिए
सिर पर टोपी लगा लेता है
पैरों में बंधे घुंघरू की
छनकार पर
ठुमके लगाता है
कंधे पर लाठी रख
करतब दिखाता है
और कटोरा सिर पर रखे
दर्शकों से पैसे बटोर लाता है
वह भूख से बेदम है
शाम घर लौट कर ही
उसके आगे रखेगा मदारी
रोटी के टुकड़े
ताज्जुब है
उसे जानवर से
इंसान बनाने की सारी प्रक्रिया
मदारी का पेट भरती है
जबकि इंसान से
जानवर हुआ मदारी
उसे भूखे पेट रखकर
बटोर लेता है
जिंदगी की ख़ुशियाँ, उल्लास
नहीं चाहता वह
इंसानों की गुलामी ,अत्याचार
स्वार्थ से भरी दुनिया
उसे अपने जंगल और
जंगली होने पर नाज़ है