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भगत सिंह की माशूका / सीमा संगसार

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दो चुटिया बाँधे
उस अल्हड़ लड़की ने
अभी-अभी तो
जमीं पर पाँव रखा ही था
दुनिया अभी गोल होने की प्रक्रिया में थी
और / पृथ्वी चपटी होती जा रही थी...
उसकी नजरें अभी
पृथ्वी के उन अवांछित फलों पर,
ठीक से टिकी भी नहीं थी
जिसे चख लेने पर
भंग हो जाती है सारी नैतिकताएँ!
ठीक उसी वक़्त
उसकी नज़रें
तीर से भी आक्रामक
उस क्रांतिकारी नज़र से
ऐसे विंध गयी
की उसे वह फल खाना
याद ही न रहा
जिसे खाने के लिए वह
उतरी थी ज़मीं पर...
भगत सिंह तो उसी दिन शहीद हो गए थे
जिस दिन उनकी नजरें
इस माशूका से मिली थी!
प्रेम की कोंपलें फूटने से पहले ही
उन्हें दफना देना
हमारे देश की प्रथा रही है
उन दोनों को भी
यह रस्म अदायगी करनी पड़ी...
भगत सिंह जेल के सीखचों से
निहारते रहे अपनी माशूका का चेहरा
और वह अल्हड़ लडकी
पथ्थरों को फेंक–फेंक कर
गिनती रही
उन बेहिस वक़्त की रवायतों को...
वह आजीवन कुंवारी मासूमा
जिसका कौमार्य कभी भंग नहीं हुआ
आज भी कूकती है
अमिया के बागों में
और / भगत सिंह वहीँ उसकी डालों पर
झूल रहे हैं
फाँसी का फंदा बनाकर...
कुछ कहानियाँ कभी ख़तम नहीं होती
और / कुछ प्रेम कवितायें लिखी नहीं दुहराई जाती हैं...