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भजो भारत को तन-मन से / मैथिलीशरण गुप्त

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भजो भारत को तन-मन से।
बनो जड़ हाय! न चेतन से॥

करते हो किस इष्ट देव का आँख मूँद का ध्यान?
तीस कोटि लोगों में देखो तीस कोटि भगवान।
मुक्ति होगी इस साधन से।
भजो भारत को तन-मन से॥

जिसके लिए सदैव ईश ने लिये आप अवतार,
ईश-भक्त क्या हो यदि उसका करो न तुम उपकार।
पूछ लो किसी सुधी जन से।
भजो भारत को तन-मन से॥

पद पद पर जो तीर्थ भूमि है, देती है जो अन्न,
जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो करो उसे सम्पन्न।
नहीं तो क्या होगा धन से?
भजो भारत को तन-मन से॥

हो जावे अज्ञान-तिमिर का एक बार ही नाश,
और यहाँ घर घर में फिर से फैले वही प्रकाश।
जियें सब नूतन जीवन से।
भजो भारत को तन-मन से॥