भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

भुरभुरा वजूद मरता जा रहा है / दीप्ति गुप्ता

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

भुरभुरा वजूद मरता जा रहा है
कस के आज अवसाद ने पकड़ा हुआ है
बेतरह दिल को यूँ ही जकडा हुआ है
ये सरापा मुझको ढकता जा रहा है
भुरभुरा वजूद मरता जा रहा है

सोख कर मेरा समंदर, औ’ नामाकाश पीकर
मानो हर सूं उतर गया है,रग-रग में ये भर गया है

बेरहम जाता नहीं ये, बेदर्द बन ठहरा हुआ है,
संग मेरे लग गया है, तंग करता जा रहा है
भुरभुरा वजूद मरता जा रहा है

तोड़ दी है इसने, मेरी सारी हिम्मत
रेत के टीले तले मन दब गया है
बेइंतहा बेदम मुझे ये कर गया है
रूह में भी कुछ दरकता जा रहा है
भुरभुरा वजूद मरता जा रहा है