भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

भोजपुरी मल्लाह संवाद / शार्दूल कुशवंशी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सुगवा के नियम...ठोरवा हे गोरी तोहार।
सरिका के नियन ...तोहर बात रे ...!
चकई-चकोरा ...नियन साथ रे...!

धनवा के बाली जईसे, मखन के प्याली जईसे।
जान मारे तोरे मुस्कान रे...!
नदी जे नलवा जाईं, तैरत भंवरवा जाईं।
तबो ना पीछा छोड़े, तोहरी इयाद रे...!

जड़वा के दिनवा में, कोहरा-कुहसवा में।
डोंगी लेके निकलीं, चाहे सगरवा में।
सह लींला विपत्त सब, बस तोहरी आस रे...!

जाल-महाजाल फेंकी, दोसर देस के केवटिन रे...!
मोर मल्लाहन के डगे नाहीं देवे, प्यार रे...!
धीरज धरिह गोरी, साल-छह महिनवा।
संगे खाईल जाई, भात अरु माछ रे...!
सूरज के लाली देखी बेरी-बेरी, आवे तोरी याद रे!

महुआ के फुलवा नियन, कोमल तोरी देहिया।
खुशबू देला सागर पार रे...!
शेष उमर काटब, तोरे संगे कसम तोरी।
जिनगी के एईगो, तू यार-यार रे...!