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मकतल पे आ के जां ये फ़िदा कर चुके हैं हम / प्रेमचंद सहजवाला

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मकतल पे आ के जां ये फ़िदा कर चुके हैं हम
‘कातिल से रस्मो राह सिवा कर चुके हैं हम’ [1]

मस्लूब का सलीब पे रक्खा हुआ है सर
क्या कीजिये कि अब तो खता कर चुके हैं हम

हासिल हो कैसे शीशे से वो अक्स गुमशुदा
अफ़सोस खुद से खुद ही दगा कर चुके हैं हम

जिन मुल्ज़िमों ने रौशनी ज़ुल्मत से कैद की
उनको ज़मानातों पे रिहा कर चुके हैं हम

वाइज़ से दोस्ती हुई जब से है दोस्तो
मयखाने का पता भी पता कर चुके हैं हम

किस राह काफिला सरे-मंज़िल पहुँच सके
इख्लाको-शर्म कब के विदा कर चुके हैं हम

सूरज की रौशनी को हथेली में भर सकें
शब के हरेक पहर दुआ कर चुके हैं हम

ज़ेरे दरख़्त बैठ के इक सर्द छांव में
रस्तों से कितनी बार गिला कर चुके हैं हम

खुद ही तो हम ने शौक से बोए थे ज़लज़ले
बरबादियाँ भी अपनी रवा कर चुके हैं हम


दीवानगी का कोई मुदावा कोई कहे
इस मर्ज़ की हरेक दवा चुके हैं हम

शब्दार्थ
  1. फैज़ अहमद फैज़