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मदनोत्सव / संतोष श्रीवास्तव
Kavita Kosh से
शाकुंतलम के पन्नों से
मदनोत्सव झांक रहा है
क्या तुम आ गए बसंत ?
पर तुम्हारे आगमन की सूचना
न कोयल ने दी
न भ्रमरों की गुंजन ने
पुरवईया भी तो नहीं बही
बौर भी सुवासहीन
स्निग्ध ,मादक स्पर्शहीन
तुम्हारे अस्तित्व की
निरंतरता,प्रतिबोधन
न जाने किन सीमाओं पर
ठिठके हुए हैं
जैसे श्रंखला में गुंथे जा रहे
उम्र के बीते वर्ष
गुंथन में प्रस्फुटन कहाँ?
मदिर गन्ध,दूधिया चाँदनी को
तलाशता-सा मन
क्यों आकुल व्याकुल
क्यों छंद बदल रहे हैं
लय भटक रही है
यह मन की उद्विग्नता ही तो
आने का संकेत है तुम्हारा
फिर मैं तुम्हारे आने का प्रमाण
क्यों तलाश रही बाहर
जब दहक रहे पलाश वन
मदनोत्सव उतर रहा
आहिस्ता
मन की दहलीज़ से