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मधरी मधरी राग / ओम पुरोहित कागद

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कुण कै’देवै
इण नै कीड़ी नगरो
चावै
कीड़्यां आवै-जावै
भंवै
बिलां दर बिलां
पड़तख है
माटी बणी बंसरी
बंसरी रै बेजां
भंवै कीड़्यां
सुणै
मधरी-मधरी राग
जकी भंवै हाल
गवाळियां रै ठंठा निसर
काळीबंगा रै सूनै थेड़ थिर
सूनी गळियां।