भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

मन की कहा कहों मनमोहन! / स्वामी सनातनदेव

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

राग सोहनी, तीन ताल 28.8.1974

मनकी कहा कहों मनमोहन!
इत-उत ही अटकट भटकत है, टिकत नाहिं एक हुँ छिन॥
हौं हार्यौ समुझाय प्रानधन! होत ढीठ यह दिन-रात।
तुम्हरो ह्वै तुम ही को भूलत-ऐसो है यह कृतघन॥1॥
कहा कहों, कछु बस नहिं मेरो, चलत नाहिं अपनो प्रन।
पुनि-पुनि नाथ! हार ही मानी, करि देखे बहु प्रयतन॥2॥
अब तो याहि आप ही साधहु, करहु कृपा मनमोहन!
अपनो जानि याहि अपनावहु, आय प्यौ तव चरनन॥3॥