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मन की वीणा को निद्रा में, अभिनव तार सजाने दो! / रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’

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मन की वीणा को निद्रा में,
अभिनव तार सजाने दो!
सपनों को मत रोको!
उनको सहज-भाव से आने दो!!

स्वप्न अगर मर गए,
ज़िन्दगी टूट जाएगी,
स्वप्न अगर झर गए,
बन्दगी रूठ जाएगी,
मज़बूती से इनको पकड़ो,
कभी दूर मत जाने दो!
सपनो को मत रोको!
उनको सहज-भाव से आने दो!!

सपना इक ऐसा पाखी है,
पर जिसके हैं टूट गए,
क्षितिज उड़ानों के मन्सूबे,
उससे सारे रूठ गए,
पल-दो-पल को ही उसको,
दम लेने दो, सुस्ताने दो!
सपनो को मत रोको!
उनको सहज-भाव से आने दो!!

जीवन तो बंजर धरती है,
बर्फ़ यहाँ पर रुकी हुई,
मत ढूँढो इसमें हरियाली,
यहाँ फ़सल नही उगी हुई,
बर्फ़ छँटेगा, भरम हटेगा
ग़र्म हवा को आने दो!
सपनो को मत रोको!
उनको सहज-भाव से आने दो!!