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मरणोन्मुख / जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

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सुख-दुख, हास-अश्रु के जग से ऊपर उठ, होकर अविकार,
मुझे पूर्णता के मधुवन में कर लेने दो मुक्त विहार।
इस आनंद-उषा में जग का तम-प्रकाश छिप जाने दो,
जीवन के साधना-शिखर पर उत्सव आज मनाने दो।
आ पहुँचा आह्वान, शृंखला टूटी, साध मिटाने दो,
मेरी लघुता को ‘विराट’ की महिमा में मिल जाने दो।