महानगर में ऋतुराज बसंत / संतोष श्रीवास्तव
पहाड़ों की बर्फ चटखेगी
सुधियों के झरने आहिस्ता झरेंगे
ढलानों पर कोमल दूर्वा की
बिछावन पर सपने छलेंगे
पिछली रात की आँधी में
मंजरी से सूनी हुई डाल पर
कोयल ढूँढेंगी कोई तराना
कोई नशीला गीत
जो रात भर चल कर आई
स्मृतियों में अपने होने का
सच जानेगा
ईट के भट्टे पर बोझा ढोते
मीठे वासंती चावलों का
सपना संजोए
घर लौटे रमुआ की हंडिया में
नहीं आता बसन्त
बासंती रंग में
थिगली लगी साड़ी रंग
कितना भी करे इंतज़ार धनिया
नहीं आता बसन्त
हवाओं की निगरानी में
भौंरों और तितलियों को
अपना दूत बना
छा जाता है हरे भरे पेड़ों पर
मुरझाए को दरकिनार कर
नहीं ठहरता बसन्त वहाँ
बसन्त भी तो आता है
सत्ताधारियों जैसा
हर पेड़ से रूप ,रस, गंध वसूलने
पतझड़ से ठूँठ डालियों का घाव
नहीं देखता ऋतुराज बसंत