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माँ तू कैसे जा सकती है तेरी यादें ज़िंदा हैं / डी. एम. मिश्र

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माँ तू कैसे जा सकती है तेरी यादें ज़िंदा हैं
मेरी आँख खोलने वाली तेरी आँखें ज़िंदा हैं

उठो लाल अब आँखें खोलो, याद अभी तक वो कविता
टिक- टिक करती घड़ी बोलती तेरी साँसें ज़िंदा हैं

माँ की ममता क्या होती है साक्षी हैं जो पल-पल की
वो सुबहें भी ज़िंदा हैं,वो सारी रातें ज़िंदा हैं

आप क़िताबें पढ़कर बोलें, मैं बोलूँ मादरी जु़बाँ
जिसको जनता अपना लेती वही ज़ुबानें ज़िंदा हैं

बहुत मज़ा आता था माँ जब मुझे डाँट कर रो देती
जिनसे हरा- भरा हूँ अब तक वो बरसातें ज़िंदा हैं

माँ मेरी अब इस दुनिया में नहीं रही कैसे मानूँ
मेरे ओठों पर जब तक मीठी मुस्कानें ज़िंदा हैं

रोम-रोम में बसने वाली मेरी प्यारी- प्यारी माँ
जब तक मेरी साँस चल रही तेरी बातें ज़िंदा हैं