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माटी की इस मूरत पर / शिशुपाल सिंह यादव ‘मुकुंद’

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मैं कौन हूँ ? आया कहाँ हूँ ? करना यहाँ है क्या मुझे
सोचा कभी एकाग्र चित्त से,फिर भरम हुआ कैसे मुझे
कहाँ ज्ञान को फेका तूने,क्यों असत्य पर ध्यान धरे
माटी की इस मूरत पर तू क्यों अधिक गुमान करे

पके केश सिर,नख रव टूटे,माया ममता तदपि बढ़ी
बोल रही मुस्काती मृदु-मृदु,ईर्ष्या नागिन शीश चढ़ी
ब्रम्हामृत को त्याग मूढ़ तू,विषय जहर क्या पान करे
माटी की इस मूरत पर तू क्यों अधिक गुमान करे

क्या पहिचान गरीबो से है,अरे स्वार्थ का व्यापारी
तुझे स्वर्ग ही अतिशय प्रिय है,तव सिर पर गठरी भारी
कब-कब है बन पाया जग में,कह तो तू इंसान खरे
माटी की इस मूरत पर तू क्यों अधिक गुमान करे

मैं हूँ मेरा महल बनेगा,खूब जमीदारी होगी
समय बहुत जीने का मेरा, सुन्दर फुलवारी होगी
रह जाएंगे इस दुनिया में,तेरे विविध -विधान धरे
माटी की इस मूरत पर तू क्यों अधिक गुमान करे

यह प्रासाद धनद का, धन यह,यह मेरा सुत प्यारा है
तेरे हित ज्यों मीन फंसाने,यह बंशी का चारा है
क्या बटोर कर मूर्ख कब तक,इठलायेगा मान मरे
माटी की इस मूरत पर तू क्यों अधिक गुमान करे