भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

माय मिथिला के पैर में बेरी / नीतीश कर्ण

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

माय मिथिला के पैर में बेड़ी,गुमनाम मैथिल संस्कार
मंगला सs तs भीख ने भेटत,लईड कs लिय अपन अधिकार
जनक ऋषि के वन्सज के, गरम खून किया पड़ल शिथिल
लेभरायल आँखिक काजरि, उजड़ल - उपटल माँ मैथिल
उपेक्षित जिंदगी बड जिलउँ,आब ने कनिको धीर धरू
बेर आईब गेल फूंकु पाञ्चजन्य,हर-हर महादेव उद्घोष करू
खून बिना आज़ादी कहाँ, आब उठाबू तीर-कमान
कटइ छई तs कईट जाओ गर्दन, बनल रहे पागक सम्मान
आशीर्वाद कोशी गंडक के, देखा दियउ रूप विकराल
माय मिथिला चित्कारि रहल अछि, बहा दियउ शोणित के धार
लिय टेंगारी लाठी भाला, परशुराम के रूप धरू
घोर अन्हरिया राइत बहुत भेल, जागू मैथिल भोर करू