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मीठी नीम की एक टहनी / शरद कोकास

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पेंशनभोगी आदमी की देह पर
अंगों का साथ छूटने की उम्र में
ऊगने लगते हैं कुछ नये अंग
चश्मा, टोपी, लाठी या झोला
(जो अक्सर लाश पर भी बने रहते हैं )
झोला छाप आदमी
चौराहे से गुजरते हुए
राशन की दुकान पर
शक्कर आने की सूचना मिलते ही
खड़े करता है अपने कान
 
बाज़ार में
पक्के चबूतरों से दूर
किनारे की दुकानों पर
सामानों के ढेर में
गुम हो जाती हैं उसकी आँखें
 
मौसम की सस्ती सब्ज़ियाँ
नाती-पोतों के लिये जामुन अमरूद
या जलेबी का दोना खरीदते वक़्त
जेबें टटोलता है वह
 
घर लौटते हुए
किसी ऐसे मित्र के
घर के सामने से गुजरता है वह
जिसके अहाते में मुनगे का पेड़ हो
क्या पता हाल - चाल पूछने पर
मुनगे की दो-चार फल्लियाँ
साथ में मीठी नीम की एक टहनी मिल जाये
 
महँगाई को रोते पड़ोसी देख लेते हैं
झोले में रखी चीज़ें
उसके चेहरे पर
घर लौटते ही
झोले पर टूट पड़ते हैं
नाती-पोते और बहुयें
 
खाली झोला लिये घर लौटना
उसके लिये
उस दिन का
सबसे बड़ा दुख होता है।