Last modified on 25 दिसम्बर 2020, at 00:07

मूक हैं गान ! / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

131
मन अधीर
द्रौपदी के चीर-सी
बढ़ गई है पीर
डूबी है सृष्टि
मिला न कोई छोर
तुम्हीं जीवन-डोर ।
132
मूक हैं गान
अश्रु में डूबा नभ
बिछुड़ गई धरा
प्राण विकल
जीने के लिए नित
मरे कई मरण।





[ तीसरा पहर]