131
मन अधीर
द्रौपदी के चीर-सी
बढ़ गई है पीर
डूबी है सृष्टि
मिला न कोई छोर
तुम्हीं जीवन-डोर ।
132
मूक हैं गान
अश्रु में डूबा नभ
बिछुड़ गई धरा
प्राण विकल
जीने के लिए नित
मरे कई मरण।
[ तीसरा पहर]
131
मन अधीर
द्रौपदी के चीर-सी
बढ़ गई है पीर
डूबी है सृष्टि
मिला न कोई छोर
तुम्हीं जीवन-डोर ।
132
मूक हैं गान
अश्रु में डूबा नभ
बिछुड़ गई धरा
प्राण विकल
जीने के लिए नित
मरे कई मरण।
[ तीसरा पहर]